



जिला ब्यूरो, विवेक कुमार सिंह
बेतिया/वाल्मीकिनगर:-देश की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले वीर सपूतों में वाल्मीकिनगर थाना क्षेत्र के पिपराकुट्टी निवासी स्वतंत्रता सेनानी लांस नायक जमींदार सिंह का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आह्वान पर आज़ाद हिंद फौज में शामिल होकर उन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा लिया और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी देशभक्ति की लौ को बुझने नहीं दिया। उनके अदम्य साहस और बलिदान के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था। जमींदार सिंह न केवल आजाद हिंद फौज के एक सैनिक थे, बल्कि सही मायनों में स्वतंत्रता संग्राम के सारथी थे। 10 मई 2014 को उनके निधन के साथ एक युग का अंत हो गया, लेकिन उनकी स्मृतियां और योगदान आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं। जीवन के अंतिम पड़ाव तक वे स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर पूरे उत्साह और गरिमा के साथ झंडोत्तोलन करते थे। गांव के लोगों, बच्चों और युवाओं को एकत्र कर वे मिठाई बांटते और आज़ादी की लड़ाई से जुड़े अपने अनुभव साझा करते थे। वे विशेष रूप से युवाओं और स्कूली छात्रों के लिए प्रेरणास्रोत थे। उनके पुत्र हरिश्चंद्र सिंह आज भी अपने पिता की इस परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ निभा रहे हैं और नई पीढ़ी को स्वतंत्रता संग्राम की गौरवशाली गाथाओं से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं।
25 दिन भूखे रहकर लड़ा युद्ध
आज़ाद हिंद फौज के सिपाही जमींदार सिंह ने युद्ध के दौरान असाधारण साहस का परिचय दिया। करीब 60 फौजियों के साथ वे दो हजार फीट ऊंचे पोपाटांव पहाड़ी क्षेत्र पर पहुंचे, जहां उन्हें दुश्मनों का रास्ता रोकने की जिम्मेदारी दी गई। राशन और पानी के अभाव में उन्होंने 25 दिनों तक अत्यंत कठिन हालात में संघर्ष किया। इस दौरान वे जंगल में केले को आग में भूनकर जीवन यापन करते रहे। दुश्मन सेना की बमबारी में कई साथी जवान शहीद हो गए, लेकिन जमींदार सिंह और उनके साथियों ने मोर्चा नहीं छोड़ा। 25 दिनों के बाद जब फौजी कंपनी मदद के लिए पहुंची और राशन-पानी उपलब्ध हुआ, तब कुछ समय बाद स्वयं नेताजी सुभाष चंद्र बोस पोपाटांव पहाड़ी पर आए। नेताजी ने बताया कि जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर मित्र राष्ट्रों द्वारा परमाणु बम गिराए जाने के बाद जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया है और इस युद्ध में आज़ाद हिंद फौज के कई जवान मारे गए हैं। इस परिस्थिति में नेताजी के आदेश पर सभी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया।
कैद, यातनाएं और वापसी
आत्मसमर्पण के बाद जमींदार सिंह को बांबो हवाई अड्डा से चटगांव जेल लाया गया, जहां उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं। इसके बाद उन्हें चटगांव के शैलीलगंज जेल में रखा गया, जहां आधा पेट भोजन देकर पहाड़ों पर कठोर श्रम कराया जाता था। छह माह बाद उन्हें जिगर कच्छा और फिर दिल्ली लाया गया। दिल्ली में वे महात्मा गांधी की प्रार्थना सभाओं में शामिल हुए और वहां पहरा देने का कार्य भी किया। जवाहरलाल नेहरू के प्रयास से उन्हें वर्मा जाने का आदेश मिला और अप्रैल 1947 में वे वर्मा लौटे। हालांकि 1948 में वर्मा सरकार द्वारा भारतीय मूल के लोगों के साथ भेदभाव बढ़ने पर उनकी संपत्तियां जब्त कर ली गईं। अंततः इंदिरा गांधी के प्रयास से अप्रैल 1974 में वर्मीज रिफ्यूजी के रूप में वे पुनः अपनी मातृभूमि भारत लौटे। 96 वर्ष की आयु में 10 मई 2014 को जमींदार सिंह का निधन हुआ, लेकिन उनका जीवन आज भी देशभक्ति, त्याग और संघर्ष की अमिट मिसाल बना हुआ है।










