



तुम्ह ते अधिक पुन्य बड़ काकें। राजन राम सरिस सुत जाकें।।
बीर+ बिनीत+धरम ब्रत धारी तथा गुन सागर बालक बर चारी।। संसार में बहुत से वीर होते आए हैं किन्तु उनमें दोष उत्पन्न हो जाता है कि वे अहंकारी हो जाते हैं -कहु सठ मोहि समान को जोधा।वे यही समझने लगते हैं कि जिसमें शक्ति है वही सत्य है और ऐसा व्यवहार करने लगते हैं जैसे वे कभी मरेंगे ही नहीं – नहिं नास कल्पांत अभिमान असा। किन्तु राम जी ऐसे अद्वितीय वीर हैं जिनमें वीरता के साथ साथ विनम्रता है – बीर बिनीत धरम ब्रत धारी। अहंकारी वीर, उद्दंड वीर आदि बहुत हो सकते हैं किन्तु विनम्र नगण्य।परशुराम जी कहते हैं कि – रे नृप बालक! धनुष तोड़ने के कारण तुझे बहुत अभिमान हो गया है, किन्तु सत्य क्या है – भृगुपति बकहिं कुठार उठाए। फिर भी -मन मुसुकाहिं रामु सिर नाए ।।राम जी दोनों हाथ जोड़कर नतमस्तक हैं। वे अपने पिता के आज्ञा को सर्वश्रेष्ठ धर्म मानते हैं (पितु आयसु सब धरमका टीका) ,गुरु आदर, गुरु सेवा विप्र सेवा पग पग पर उनके आचरण में दिखाई देता है। हे राजन! इसी प्रकार आपके चारों पुत्रों में वीरता, विनम्रता, धर्मपरायणता तथा शील आदि समस्त गुण भरे हुए हैं। तो विचार करिए कि जो ऐसे चार चार पुत्रों के पिता है उससे बड़ा पुण्यमय कौन है?ऐसे पिता का वर्तमान, भूत और भविष्य सब मंगलमय होता है…










