भोलेनाथ तो बस श्रद्धा और व‍िश्‍वास देखते हैं -: पं०भरत उपाध्याय

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भोलेनाथ की कृपा के ल‍िए क्‍या देवी-देवता तो क्‍या राक्षस? वह अपनी शरण में आए सभी श्रद्धालुओं पर न केवल कृपा करते हैं बल्कि उन्‍हें मनोवांछित फल भी प्रदान करते हैं। ऐसी ही एक कथा जुड़ी है मृत्‍यु के देवता यमराज से। जब उन्‍होंने भोलेनाथ को यूं ही ब‍िना क‍िसी वाहन के भ्रमण करते देखा तो उनके मन में एक इच्‍छा जाग्रत हुई। बस फ‍िर क्‍या था यमराज ने भगवान शंकर के समक्ष अपनी इच्‍छा प्रकट की और फ‍िर क्‍या हुआ आइए जानते हैं… पौराण‍िक कथाओं के अनुसार भगवान शिव बिना किसी वाहन के ही संपूर्ण संसार में विचरण करते थे। एक दिन जब वह जगत में विहार कर रहे थे तो यम ने उन्‍हें देखा। उनके मन में यह बात आई कि वह भोलेनाथ के वाहन बन जाएं। लेकिन यह इतना सहज नहीं था तो उन्‍होंने शिव को प्रसन्‍न करने के लिए कठिन तप किया। यम के तप से शिव शंभू प्रसन्‍न हुए और उन्‍होंने यम को बैल रूप में अपना वाहन बनाना स्‍वीकार किया। भोलेनाथ ने बैल रूप को इसलिए चुना क्‍योंकि बैल अत्‍यंत भोला होता है। उसके मन में किसी भी प्रकार का छल-कपट नहीं होता। यही वजह है कि भोले बाबा ने बैल यानी कि नंदी को अपना वाहन नियुक्‍त किया। यही नहीं शिव जी ने नंदी को अपना प्रधान सेनापति भी बनाया। कहा जाता है कि भगवान शिव की सेना नंदी बाबा के कहने पर ही चलती है।पौराणिक कथाओं के अनुसार पुरातन काल में एक शिलाद नाम के एक ऋषि हुए। जो कि पूर्ण रूप से प्रभु की पूजा में लीन रहने लगे थे। ऐसे में परिवार के लोगों को उनके वंश की चिंता हुई। यह परेशानी लेकर सभी उनके पास पहुंचे और गृहस्‍थ जीवन में वापस आने का निवेदन किया। हालांकि वह नहीं माने, लेकिन उन्‍होंने जन्‍म-मृत्‍यु से परे संतान प्राप्ति के लिए देवराज इंद्र की पूजा की। इंद्र प्रसन्‍न हुए तो लेकिन ऐसी संतान का आशीर्वाद देने में असमर्थतता जाहिर की। जब इंद्रदेव से इच्‍छा मुताबिक संतान प्राप्ति का आशीर्वाद नहीं मिला तो शिलाद मुनि ने शिव की पूजा की। उनके कठोर तप से शिव अत्‍यंत प्रसन्‍न हुए और स्‍वयं उनकी संतान के रूप में जन्‍म लेने की बात कही। कथा मिलती है कि एक दिन शिलाद मुनि खेत जोत रहे थे तब उसी भूमि पर उन्‍हें एक बालक मिला। वह उसे घर ले आए और उसका नाम नंदी रखा। भगवान भोलेनाथ ने मित्र और वरुण नाम के दो मुनियों को नंदी के पास भेजा। उन्‍होंने नंदी को बताया कि वह अल्‍पायु हैं। यह सुनकर नंदी बाबा वन में चले गए और महादेव की पूजा-अर्चना करने लगे। उनकी पूजा से भोलेनाथ प्रसन्‍न हुए और नंदी को मृत्‍यु भय से मुक्‍त अजर-अमर होने का आशीर्वाद दिया। इसके अलावा गणों के अध‍िपति के रूप में भी नियुक्‍त किया। कथा मिलती है कि जब असुरों और देवताओं के बीच समुद्र मंथन चल रहा था और उसमें से विष निकला था। तो उसे शिव ने धारण किया था। लेकिन विषपान के दौरान कुछ बूंदें जमीन पर गिर गई थीं और उन्‍हें नंदी ने अपनी जीभ से चाट लिया था। नंदी के इस भाव पर भोले अत्‍यंत प्रसन्‍न हुए। इसके बाद भगवान ने नंदी को अपने सबसे बड़े भक्‍त की उपाधि दी। साथ ही उन्‍होंने कहा कि जो शक्तियां उनकी हैं वह नंदी की भी हैं। भोलेनाथ की कृपा पाने को ज्ञान स्‍वरूप तप और विष की बूंदें को चाटने की पवित्रता नंदी बाबा की महिमा को और भी बढ़ा देती हैं। इनसे लगाई गई अर्जी कभी खाली नहीं जाती भोले बाबा ने नंदी को यह आशीर्वाद दिया था कि उनकी पूजा से पहले नंदी की पूजा की जाएगी। यही वजह है कि हर शिवालय में नंदी बाबा की मूर्ति जरूर होती है। यही नहीं यह भी मान्‍यता है कि यदि आपको भोलेनाथ से कुछ मांगना है तो उनकी पूजा से पहले नंदी की पूजा की जाएगी। यही वजह है कि हर शिवालय में नंदी बाबा की मूर्ति जरूर होती है। यही नहीं यह भी मान्‍यता है कि यदि आपको भोलेनाथ से कुछ मांगना है और आपने नंदी बाबा के कानों में सच्‍ची श्रद्धा, पवित्रता और अटूट निष्‍ठा से अपनी बात कह दी तो वह भोलेनाथ तक जरूर अर्जी पहुंचा देते हैं। यही नहीं शिवजी भी मुराद पूरी कर देते हैं।

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