दो पीढ़ियों के बीच तुलना :- पं० भरत उपाध्याय

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एक युवक ने अपने पिता से पूछा :“आप लोग पहले कैसे जीते थे?”तकनीक नहीं थी,हवाई जहाज़ नहीं थे,इंटरनेट नहीं था,कंप्यूटर नहीं थे, नाटक नहीं थे, टीवी नहीं था, सिनेमा नहीं था,वायु प्रदूषण नहीं था,गाड़ियाँ नहीं थीं, मोबाइल फोन नहीं थे
उसके पिता ने उत्तर दिया:“जैसे आज तुम्हारी पीढ़ी जी रही है…” भक्ति नहीं, ज्ञान नहीं, संतों का परिचय नहीं, ग्रंथों का ज्ञान नहीं, शांति नहीं, संयम नहीं, धर्मनिष्ठा नहीं, कुल-धर्म और परंपराएँ नहीं, प्रार्थनाएँ नहीं ,त्योहार नहीं ,करुणा नहीं ,सम्मान नहीं, आदर नहीं, आदर्श नहीं ,संस्कार नहीं ,लज्जा नहीं ,रिश्ते-नाते नहीं, नम्रता नहीं ,स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता नहीं ,समय का नियोजन नहीं– खेल नहीं ,पढ़ने की आदत नहीं ,सेवा भाव नहीं“ हम, जो 1940 से 1980 के बीच जन्मे लोग हैं, वास्तव में धन्य हैं। हमारा जीवन इसका जीवंत प्रमाण है:”खेलते समय और साइकिल चलाते हुए हमने कभी हेलमेट नहीं पहना। स्कूल से आने के बाद शाम तक खेलते रहते थे, कभी टीवी नहीं देखते थे। हमने इंटरनेट मित्रों के साथ नहीं, बल्कि सच्चे मित्रों के साथ खेला। प्यास लगने पर नल का पानी पिया, बोतलबंद पानी नहीं।हम कभी बीमार नहीं पड़े, फिर भी चार दोस्त एक ही गिलास में जूस पी लेते थे।रोज़ भरपेट चावल खाने के बावजूद हमारा वजन कभी नहीं बढ़ा। नंगे पाँव चलने पर भी हमारे पैरों को कुछ नहीं हुआ। माता-पिता ने हमें स्वस्थ रखने के लिए कभी सप्लीमेंट्स का उपयोग नहीं किया।हम अपने खिलौने खुद बनाते थे और उनसे खेलते थे।
हमारे माता-पिता अमीर नहीं थे, लेकिन उन्होंने हमें प्यार दिया, भौतिक चीज़ें नहीं। हमारे पास मोबाइल, डीवीडी, प्ले स्टेशन, एक्सबॉक्स, वीडियो गेम, पर्सनल कंप्यूटर या इंटरनेट चैट नहीं था — लेकिन हमारे पास सच्चे दोस्त थे। हम बिना बुलाए दोस्तों के घर चले जाते थे और उनके साथ भोजन करते थे।आज की दुनिया के विपरीत, हमारे रिश्तेदार पास-पास रहते थे, इसलिए पारिवारिक समय और रिश्ते खुशहाल थे।हम भले ही ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों में हों, लेकिन उन तस्वीरों में रंगीन यादें हैं। हम एक अनोखी और सबसे समझदार पीढ़ी हैं क्योंकि हम आख़िरी पीढ़ी थे जिन्होंने अपने माता-पिता की बात मानी, और पहली पीढ़ी हैजिन्हें अपने बच्चों की बात सुननी पड़ी। और हम ही वे लोग हैं जो आज भी समझदार हैं और उस तकनीक को सीखने-समझने में आपकी मदद कर रहे हैं जो हमारे समय में अस्तित्व में ही नहीं थी!
अंत में — दिन तो चले गए , लेकिन यादें रह गईं।

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