



वैराग्य क्या है, वैराग्य का उद्देश्य क्या है? गृहस्थ में रहकर वैराग्य की अवस्था कैसे आये? मार्गदर्शन करें महाराज जी।
उत्तर:-प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज वैराग्य अंदर की वस्तु या अवयव है , बाहर का नहीं । वैराग्य का उद्देश्य क्या है ? भगवान का भजन ।मुख्य है कि भजन होना चाहिए , वह चाहे घर में रहकर हो , वन में , गृहस्थ या सन्यास लेकर हो ।वैराग्य का अर्थ केवल इतना है कि अपने प्रियतम प्रेमास्पद भगवान को छोड़कर मन और हृदय में किसी को भी स्थान न मिले ।न किसी से राग हो और न ही किसी से द्वेष ।वैराग्य का अर्थ है बस उन्हीं में ही मन का लगाव । संसार से हटाकर मन विराट , सत्य और आंतरिक संसार में लगाना । बाहरी परिस्थिति को हम जितना अनुकूल बनाना चाहेंगे , उतना ही हम फँसते जायेंगे । आप जिस भी परिस्थिति में हैं , वहीं अपने प्रेमास्पद का स्मरण करना है , बस यही वैराग्य है । वैराग्य को बड़ी दाढ़ी , बड़ी जटा , भगवा वस्त्र , बड़ी बड़ी मालायें , सिर मुड़ाने आदि से सम्बंधित नहीं है । यह मन का अवयव है । जैसे कमल कीचड़ में रहकर भी कीचड़ या पानी की एक बूँद तक से भी संयोग नहीं करता , बस यही है वैराग्य । इसीलिए कमल को पंकज बोला जाता है ।पंक माने कीचड़ और अज माने जन्म लिया हुआ है । जो कीचड़ से ही जन्म लेता है लेकिन कीचड़ से सदा विमुक्त रहता है ।ऐसे ही वैरागी भी वैर और राग रूपी संसार से जन्म लेता है लेकिन वैर और राग से रहित रहता है ।एक साधक था । वह सदा अंतर्मुखी अवस्था में संसार से दूर रहकर अपनी साधना करता था ।वह ध्यान में था तो किसी ने ले जाकर उसके पास कुछ रुपये चढ़ा दिए । जब आँख खुली तो देखा कि अरे यह रुपये ! वैसे उसे कोई आवश्यकता नहीं थी और न ही उन रुपयों की कोई इच्छा ।अब वह साधक सोच में पड़ गया कि इन रुपयों का क्या करना चाहिए ? किसी ब्राह्मण को दे दिया जाय ? नहीं , नहीं किसी ग़रीब को दे देते हैं ।नहीं एक काम करते हैं कि भंडारा कर देते हैं ।नहीं भविष्य में हो सकता है कि मुझे जरूरत पड़ जाए ।एक काम करता हूँ , रहने देता हूँ कोई दिखेगा जो जरुरतमंद हो तो उसे दे देंगे । उसका आधा समय तो इसी उधेड़बुन में चला गया । फिर वह ध्यान में बैठा तो वही रुपया ध्यान में आ रहा है और मन तरह तरह के विकल्प उसके सामने ला रहा है कि क्या करना है । अंत में इससे परेशान होकर वह किसी महात्मा के पास गया । तो महात्मा ने कहा कि अभी तक तुम्हारे अंदर से पैसों की महत्त्ता गई नहीं है । तुम इसे समान भाव से नहीं देख रहे हो । मन अब भी समझता है कि यह उपयोगी वस्तु है अतः इसीलिए मन इसी में रमा हुआ है ।तुम इस रुपये से किसी का परोपकार भी करने जाओगे तो इससे चित्त में “करने का” कर्तापन का संस्कार बनेगा और फिर दूसरों की आशा बढ़ेगी तुम से उपकार प्राप्त करने की । फिर आप भी यह आशा बढायेंगे कि अब दूसरों के उपकार के लिए और धन मिले ताकि *मैं* दूसरों का उपकार कर सकूँ । इस तरह तुम ध्यान से , अपनी साधना से वंचित हो जाओगे । सांसारिक व्यवहार की अपेक्षा भगवान में एक क्षण की भी वृत्ति अनंत गुना सर्वोत्तम है । इसलिए तुम अब अपने संकल्पों की श्रृंखला यहीं बंद कर दो । अब एक काम करो कि इस पैसे पर गोबर डालकर सामने नदी में बहा आओ । जब उस साधक ने ऐसा किया , तब जाकर उसकी चित्तवृत्ति शांत हुई और फिर से वह अपने ध्यान साधना में मन लगाने लगा ।तो वैराग्य का मतलब है कि सब कुछ होते हुए भी उससे विरत रहना ।










