



जिला ब्यूरो, विवेक कुमार सिंह
बेतिया/वाल्मीकिनगर :- भारत-नेपाल सीमा से सटे नेपाल के नवलपरासी जिले के महलवारी स्थित पहाड़ी पर लगने वाले प्रसिद्ध दस दिवसीय मदार बाबा मेले का शुभारंभ आज फाल्गुन पंचमी तिथि से हो गया। आस्था, विश्वास और सर्वधर्म समभाव की अनूठी मिसाल माने जाने वाले इस मेले में भारत और नेपाल सहित दूर-दराज के क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। मेला क्षेत्र में श्रद्धालुओं की चहल-पहल और जयकारों से पूरा इलाका भक्तिमय वातावरण में डूब गया है। मान्यता है कि इस पवित्र स्थल तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को सात पहाड़ियों को पार करना पड़ता है। कठिन यात्रा के बावजूद लोगों की आस्था अडिग रहती है। विभिन्न समुदायों के लोग मदार बाबा की मजार पर चादरपोशी कर अपनी मन्नतें मांगते हैं और पूरी होने पर चादर चढ़ा कर बाबा का आभार व्यक्त करते हैं। यही वजह है कि यह मेला हिंदू-मुस्लिम एकता और आपसी भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। स्थानीय जानकारों के अनुसार, सैयद हजरत वद्दीउद्दीन अरब से घूमते हुए इस क्षेत्र में आए थे। उस समय इस पहाड़ी पर दैत्यों का साम्राज्य बताया जाता है, जिनके आतंक से लोग भयभीत रहते थे। कहा जाता है कि हजरत वद्दीउद्दीन ने अपनी दैवीय शक्तियों से दैत्यों का अंत कर इस क्षेत्र में अमन-चैन स्थापित किया। लोक कथाओं के अनुसार वे बाघ की सवारी करते थे और भगवान शिव के परम भक्त थे। यही नहीं, वे मदार के पौधे का दूध पीते थे, जिस कारण वे मदार बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मदार बाबा न केवल भूत-प्रेत और बुरी आत्माओं से पीड़ित लोगों को मुक्ति दिलाते हैं, बल्कि निःसंतान दंपतियों को संतान सुख भी प्रदान करते हैं। मजार के समीप स्थित एक विशाल चंदन का वृक्ष और कोहड़ा (कद्दू) के आकार के दो पत्थर श्रद्धा का प्रमुख केंद्र हैं। ऐसा विश्वास है कि मन्नत पूरी होने की कामना से लोग कोहड़ा नुमा पत्ते या पत्थर को उठाते हैं और बाबा उनकी मुराद पूरी करते हैं। मेले के दौरान रात्रि प्रहर में मोजावरों द्वारा डंका बजाने की परंपरा निभाई जाती है। मान्यता है कि इस समय भूत-प्रेत से पीड़ित व्यक्ति स्वयं ही असामान्य गतिविधियां करने लगता है। इसके बाद चंदन के वृक्ष में कील ठोककर पीड़ित व्यक्ति को बुरी आत्माओं से निजात दिलाई जाती है। इस अद्भुत और रहस्यमयी परंपरा को देखने के लिए भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु और जिज्ञासु लोग जुटते हैं। मेला समिति और स्थानीय प्रशासन द्वारा श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए आवश्यक इंतजाम किए गए हैं। दस दिनों तक चलने वाला यह मेला न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि सांस्कृतिक एकता और लोक विश्वासों की जीवंत तस्वीर भी पेश करता है।










