वन्यजीव सुरक्षा व वन्यजीव अपराध के रोकथाम के लिए दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित।

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डब्लू डब्लू एफ के सौजन्य से जांच व अभियोजन की बारीकियों पर दो दिवसीय कार्यशाला में रेंजर, वनपाल एवं अन्य अधिकारियों को दी गई जानकारी

जिला ब्यूरो, विवेक कुमार सिंह

बेतिया/वाल्मीकिनगर:-वन्यजीव अपराधों की बढ़ती घटनाओं पर प्रभावी तरीके से रोकथाम और दोषियों को कड़ी सजा दिलाने के उद्देश्य से वाल्मीकिनगर स्थित वन विभाग के सभागार में शनिवार से दो दिवसीय वन्यजीव सुरक्षा एवं वन्यजीव अपराध पर नियंत्रण को लेकर जांच एवं अभियोजन पर क्षमता विकास प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में वन्यजीव अपराधों की गहन जांच, साक्ष्य संकलन और अभियोजन की व्यवहारिक व तकनीकी बारीकियों पर विस्तार से चर्चा की गई।
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य यह था कि वन्यजीव अपराधों में संलिप्त आरोपियों के खिलाफ मजबूत केस तैयार किया जा सके, ताकि तकनीकी खामियों के कारण उन्हें जल्द जमानत न मिल पाए। प्रशिक्षक के रूप में शामिल डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के डॉक्टर आरके सिंह ने दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला में शामिल अधिकारियों को बताया कि समय पर हस्तक्षेप, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय से न केवल अपराधों की रोकथाम संभव है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को भी मजबूत किया जा सकता है।
प्रशिक्षण के दौरान अपराध स्थल प्रबंधन और साक्ष्य संरक्षण पर विशेष सत्र आयोजित किए गए। अधिकारियों और वनकर्मियों को बताया गया कि किसी भी वन्यजीव अपराध की सूचना मिलने पर मौके का मुआयना बेहद अहम होता है। यदि किसी शिकार किए गए वन्यजीव को उठाने के लिए कर्मचारी जाएं, तो पहले मौके की स्थिति, स्थान का विवरण और आसपास के लोगों की शिनाख्त लिखित रूप में दर्ज करना आवश्यक है, ताकि बाद में न्यायालय में साक्ष्य मजबूत तरीके से प्रस्तुत किए जा सकें।


कार्यशाला में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के प्रमुख प्रावधानों, विभिन्न दंडनीय अपराधों की श्रेणियों, अनुसूचित प्राणियों की परिभाषा और उनके संरक्षण के महत्व पर भी विस्तार से जानकारी दी गई। वही 2022 के बाद वन अधिनियम में आए बदलाव के बाबत भी प्रशिक्षकों ने प्रशिक्षण में शामिल वन प्रमंडल 1- 2 के अधिकारियों को बताया कि वीटीआर क्षेत्र में अक्सर वन्यजीवों का शिकार करते हुए लोग पकड़े जाते हैं, लेकिन कई मामलों में ठोस धाराएं नहीं लग पाने के कारण आरोपी जल्द जमानत पर छूट जाते हैं। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए यह प्रशिक्षण आयोजित किया गया है। ताकि भविष्य में किसी भी घटना पर सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके। प्रशिक्षण में यह भी स्पष्ट किया गया कि वन्यजीवों को परेशान करना, कैद करना, जंगल के भीतर अवैध असलहा या धारदार हथियार लेकर जाना तथा अनुसूची प्रथम में शामिल प्रजातियों को पकड़ना या नुकसान पहुंचाना गंभीर अपराध है। इन मामलों में लापरवाही न बरतते हुए सटीक धाराओं के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए।
कार्यशाला के दौरान भारत में वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए संचालित योजनाओं जैसे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, वन संरक्षण अधिनियम, राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना, टाइगर परियोजना, राष्ट्रीय उद्यान एवं अभयारण्य तथा जैव-क्षेत्रीय रिजर्व कार्यक्रम पर भी प्रकाश डाला गया। इन योजनाओं के माध्यम से शेर, एक सींग वाला गेंडा, हाथी, मगरमच्छ सहित कई प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाया गया है।
अंत में प्रशिक्षकों ने कहा कि अब न केवल वन्यजीवों, बल्कि जंगलों में पाई जाने वाली दुर्लभ वनस्पतियों और पेड़ों के संरक्षण की भी जिम्मेदारी हम सभी की है। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम वनकर्मियों की दक्षता बढ़ाने के साथ-साथ वन्यजीव संरक्षण को और मजबूत आधार प्रदान करेंगे। दो दिवसीय प्रशिक्षण में मुख्य रूप से, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के अहबर आलम,एसीएफ सत्यम कुमार, देहरादून से आए डॉक्टर आईपी बोपन्ना, दिल्ली से आए प्रशिक्षक डॉक्टर जयदीप बोस, सीएफ डॉक्टर नेशामणि, रेंजर राजकुमार पासवान शिव कुमार राम एवं अमित कुमार सहित 40 की संख्या में वनपाल एवं अन्य अधिकारी शामिल रहे।

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