सीमावर्ती नेपाल में लगने वाले मदार शाह बाबा के 609 वर्ष पुराने मेले की तैयारियां पूरी।

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बाबा के मजार पर चादरपोशी के साथ सात पहाड़ियों की यात्रा फागून माह के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि से मेले की होगी पावन शुरुआत

जिला ब्यूरो ,विवेक कुमार सिंह

बेतिया/वाल्मीकिनगर:- आस्था का केंद्र जिंदा मजार बाबा का मजार सात दुर्गम पहाड़ियों के पार करने के बाद होता है। ऐसी मान्यता है कि यहां से कोई फरियादी आज तक खाली हाथ नहीं लौटा है। यह मेला शिवरात्री के दिन मेला समाप्त हो जाता है। यह मेला मदरसा इस्लामिया कूतबूल मदार साह बाबा विकास समिति के द्वारा मेले में आने वाले श्रद्धालुओं का विशेष ख्याल रखा जाता है। वाल्मीकिनगर से महज चार किमी की दूरी पर स्थित महलवारी (नेपाल) में यह मेला लगता है। विभिन्न देशों से आने वाले मेदिनी (श्रद्धालु) सबसे पहले महलवारी स्थित मदरिया जामा मस्जिद में इबादत करते हैं। और अगरबत्ती लोहबान जलाते हैं। प्रसाद के रुप में सीरनी, भूजा, इलाईची दाना एवं गुलाब के फूल चढ़ाने की पुरानी परंपरा है। इसके बाद से शुरु होता है कठिन चढ़ाईयों का दौर। घनघोर जंगल, पथरीले रास्ते, एवं दुर्गम चढ़ाई को पार करने के बाद पहला पड़ाव गुद्दर बाबा का स्थान आता है। जहां गुदरी, कपड़ों के कतरन, आदि चढ़ाए जाते हैं। दूसरा पड़ाव टीमकी नगाड़ा है। जहां बड़े-बड़े चट्टानों के बने पत्थर के टीमकी नगाड़े हैं। यहां मोजाबर डंका बजाते मिल जाते हैं। तीसरा पड़ाव नकधरवा है, यह सबसे कठिन चढ़ाई है। रास्ते के दोनों ओर हजारों फुट की गहरी खाई है। यहां छोटी सी भूल भी जिंदगी और मौत के फर्क को मिटा सकती है। चौथा पड़ाव चावल धोई है। यहां चावल चढ़ाने की परंपरा है। यहां श्रद्धालु सोना, चांदी, पैसा, अगरबत्ती, लोहबान आदि भी चढ़ाते हैं। पांचवां पड़ाव जंगली बाबा का स्थान है। यहां से मदार बाबा का मजार नजदीक है। छठा पड़ाव सदर गेट है। यहां सिर्फ महिलाओं को प्रवेश की अनुमति है। सातवां पड़ाव पत्थर कोंहड़ा है यहां स्त्री, पुरुष दोनों इस कोंहड़े को उठाते हैं और मन्नतें मांगते हैं। आठवां पड़ाव सहजादी का मजार है संदल के पेड़ के नीचे अवस्थित यह स्थान जहां रात्रि में मोजावर के डंके की आवाज के साथ यहां भूत-प्रेत बाधा दूर की जा जाती है। गद्दीनसीन बाबा झाड़ फूंक कर रोगियों का इलाज करते हैं। यहां ताबिज के द्वारा असाध्य रोगों का इलाज होता है। नौंवा व अंतिम पड़ाव मदार बाबा का मजार है। यहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। यहां सीरनी, अगरबत्ती, चादर, सोना चांदी, रुपये पैसे आदि चढ़ाए जाते हैं और मनचाही मुरादे मांगी जाती है। मुरादें पूरी हो जाने के बाद मुर्गा चढ़ाने का रिवाज है।

एतिहासिक पृष्ठ भूमि

नवल परासी रुपवलिया गाबीस स्थित महलवारी गांव में अरब देश से इस्लाम, मौलिया, फकीर, बदीयूद्दीन कूतबूल मदार साह बाबाइस्लाम धर्म का प्रचार प्रसार करने सर्व प्रथम कानपुर जनपद के मकनपुर होते हुए आज से लगभग 609साल पहले नेपाल पहुंचे।

उस समय नेपाल में पालपाली सेन वंशीय राजाओं का शासन था।

तत्कालीन जमीदार माधव पंजीयार एवं गुदरी गांव निवासी शेर बहादुर अमात्य के सहयोग से मदारगढ़ी में चिल्ला कसी (ध्यान साधना) की स्थापना की गई। कालांतर में फकीर बदीयूद्दीन कूतबूल मदार साह बाबा के द्वारा मदार (आक का पौधा) के दूध का सेवन करने से बाबा का नाम मदार बाबा पडा है। इस्लाम के गुरु शिष्य परंपरा के अनुसार बाबा के सात शिष्य हुए जिनमें क्रमश : बहार साह, गन्नी साह, कुर्बान अली साह, मो. अली साह, मौलाना बसीर बक्स मदारी, मो. जमीर अहमद, मो. हाजी अमिरुल्लाह अंसारी कादरी हुए। मजार बाबा स्थान इस्लाम, हिदू एवं बौद्ध धर्मावलियों के आस्था का केंद्र है। चर्चित कलाकार डी. आंनद द्वारा रहमो करम वाले मदार साह बाबा, रहमत का नूर बरसता है, दम मदार बेड़ा पार का वीडियो एलबम बनाया गया है। जिसमें देश ही नही बल्कि विदेशों में भी बाबा की धूम मची हुई है। हजरत बदीयूद्दीन कूतबूल मदार के वालिद का नाम हजरत सैयद कुतूबूद्दीन एवं वालिदा का नाम हजरत हाजरा लकब फातमा सानी, जिनका जन्म एक सौबाल 242 हिजरी बरोज दो संबा के दिन ईदउल फितर सुबह शादिक के वक्त शहर हलफ मुल्क शाम में हुआ। इस्लाम धर्म के प्रचार हेतु मक्का, मोजमा, मनीना सरीफ, बसरा फारस इरोत अल्मालियां, बरतानियां, रुस, सूड़ान, जापान, चीन, बगदाद, भारत होते हुए नेपाल पहुंचे।

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