हनुमानजी की बुद्धिमत्ता से मिला सुखद परिणाम -: पं० भरत उपाध्याय

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राम और रावण का युद्ध सत्य और असत्य के बीच संघर्ष था, जिसमें श्रीराम का विजयी होना सुनिश्चित था, लेकिन रावण को कम आंकना भी सही नहीं है। रावण बहुत बड़ा योद्धा था और उसके समान युद्ध विद्या के ज्ञाता बहुत कम लोग थे। उसके परिवार में भी कई बड़े योद्धा और युद्ध तकनीक के जानकार थे, लेकिन रावण का पतन हुआ क्योंकि वह अधर्म की राह पर था। कहा जाता है कि उस दौर में एक घटना अगर बिना किसी विघ्न के संपन्न हो जाती तो युद्ध में रावण का हारना लगभग असंभव ही हो जाता। दूसरे शब्दों में कहें तो रावण का आतंक खत्म नहीं होता। यह तब की बात है जब रावण का बेटा मेघनाद युद्ध में मारा गया। पुत्र की मौत से रावण को बहुत दुख हुआ। उसके परिजनों ने रावण का समझाया कि वह ऐसी राह छोड़ दे जो उसके विनाश की वजह बन रही है लेकिन रावण नहीं माना। उसने अपने भाई महिरावण को बुलाया और पूरी घटना बताई। रावण की तरह ही महिरावण भी बहुत बड़ा तपस्वी था। वह पाताल लोक का शासक था। उसने काली की भक्ति से कई सिद्धियां हासिल की थीं। वह कई मायावी शक्तियों का स्वामी और कुशल तांत्रिक था। रावण ने उसे समझाया कि अगर वह राम और लक्ष्मण की बलि चढ़ा देगा तो काली प्रसन्न हो जाएंगी और वह अजेय हो जाएगा। रावण की बात सुनकर महिरावण मान गया और उसने भी रावण का साथ निभाने का वादा कर लिया। क्यों हुई विभीषण को चिंता जब विभीषण को यह मालूम हुआ कि महिरावण युद्ध में शामिल हो गया है तो उन्हें चिंता हुई। वे उसकी मायावी शक्तियों के विषय में परिचित थे। उन्होंने सबको उसके बारे में बताया और हनुमानजी को यह उत्तरदायित्व सौंपा कि वे श्रीराम-लक्ष्मण की सुरक्षा करें। हनुमान ने कुटिया के चारों ओर एक रेखा खींच दी और पहरा देने लगे। महिरावण अपने खोटे इरादे लेकर वहां पहुंचा लेकिन द्वार पर हनुमानजी खड़े थे। वह उनकी शक्ति से परिचित था इसलिए युद्ध नहीं करना चाहता था। उसने विभिन्न प्राणियों का रूप धारण किया लेकिन कुटिया में प्रवेश करने में सफल नहीं हुआ। आखिरकार उसने एक चाल चली। ऐसी चाल चली महिरावण ने,विभीषण का रूप धारण किया और हनुमानजी के पास जाकर बोला, मैं श्रीराम और लक्ष्मणजी की सुरक्षा देखना चाहता हूं। यह कहकर वह भीतर चला गया। चूंकि वह विभीषण के वेश में था इसलिए हनुमानजी ने उसे जाने दिया। वह अंदर चला गया और वहीं से श्रीराम-लक्ष्मण को पाताल लोक ले गया। बाद में हनुमानजी और विभीषण को यह बात मालूम हुई। विभीषण की सलाह पर हनुमान भी पाताल चले गए। वहां महिरावण बलि चढ़ाने की तैयारी कर रहा था। कहा जाता है कि वहां हनुमान एक मधुमक्खी के वेश में गए और उन्होंने माता से पूछा, क्या आप भगवान श्रीराम का रक्त पीना चाहती हैं? जवाब में काली ने कहा, नहीं, मुझे दुष्ट महिरावण का रक्त चाहिए। यह सुनकर मधुमक्खी के वेश में हनुमान ने दोनों भाइयों के कान में उपाय बताया। बलि का समय निकट आया तो महिरावण ने श्रीराम से कहा कि वे बलिवेदी पर अपना शीश रखें। श्रीराम बोले, मैं क्षत्रिय हूं और मैंने कभी किसी के सामने शीश नहीं झुकाया। अगर तुम मुझे ऐसा करके दिखाओ तो कर लूंगा। महिरावण ने अपना सिर बलिवेदी पर रखा और उसी वक्त हनुमान अपने असल रूप में आ गए। उन्होंने उसी क्षण तलवार से महिरावण की बलि चढ़ा दी। रावण और महिरावण के मंसूबे अधूरे रह गए और श्रीराम युद्ध में विजयी होकर अयोध्या लौटे।

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