प्रभु श्री राम के ससुराल में अयोध्या वासियों का हुआ भव्य स्वागत।

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जनकपुर धाम में आयोजित विवाह पंचमी उत्सव से लौटे श्रद्धालुओं ने जनकपुर वासियों को सराहा

जिला व्यूरो, विवेक कुमार सिंह

बेतिया/वाल्मीकिनगर:-जनकपुर धाम में आयोजित श्री राम विवाह उत्सव और विवाह पंचमी उत्सव से लौट रहे उत्तर प्रदेश के लगभग एक हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने गुरुवार की सुबह वाल्मीकिनगर पहुंचे। ये श्रद्धालु जनकपुर में मिली अनुभूतियों को साझा करते हुए प्रफुल्लित हो रहे थे। वाल्मीकिनगर पहुंचने पर यूपी के महाराजगंज, अयोध्या, गोरखपुर और कप्तानगंज के श्रद्धालुओं ने त्रिवेणी संगम तट पर स्नान दान करने के बाद ऐतिहासिक मंदिरों में पूजा अर्चना किया। संगम तट पर स्नान करने के बाद जनकपुर से लौटे यूपी के श्रद्धालुओं ने माता सीता के पाताल लोक गमन मार्ग के दर्शन कर अपने आप को पुण्य के भागी समझ रहे थे। अयोध्या के श्रद्धालु रामानंद मिश्रा, शकुंतला देवी, बृज बिहारी शुक्ला एवं कप्तानगंज के उपेंद्र द्विवेदी ने बताया कि हम लोग प्रत्येक साल जनकपुर से वापस आने के क्रम में माता-सीता की पूजा अर्चना करते हैं। यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है। हम राजा जनक नगरी में अपने प्रभु श्री राम और माता सीता की विवाह कार्यक्रम में शामिल हो वर पक्ष की भागीदारी निभाई है। इससे बड़ा सौभाग्य हम लोगों के लिए और कुछ नहीं हो सकता। जनकपुर में अयोध्या वासियों का स्वागत त्रेता युग जैसा होता है। वहां के साधु संत आज भी वर पक्ष और वधू पक्ष का उद्घोषणा कर वर पक्ष के लोगों को अलग और वधू पक्ष के लोगों को अलग बैठा गारी गाई जाती है।

यूपी वालों को रक्षा सूत्र दे वस्त्र देने का रस्म किया जाता है पूरा

जनकपुर में राम विवाह उत्सव व विवाह पंचमी का उत्सव देख वापस लौटे गोरखपुर के श्रद्धालु उमाकांत शुक्ला ने बताया कि जनकपुर जाने पर ऐसा महसूस होता है कि हम वास्तव में श्री रामचंद्र का बारात लेकर आए हैं। वहां के साधु संत यूपी वालों को रक्षा सूत्र देकर वर पक्ष के लोगों को वस्त्र देने का रस्म में अदा करते हैं। भोजन के रूप में यूपी वालों को खीर और फल परोसा जाता है। यह दृश्य देख ऐसा प्रतीत होता है कि हम सही में बाराती ही हैं।

कथा मटकोर के साथ शुरू होता है राम सीता विवाह उत्सव

विवाह पंचमी के एक दिन पूर्व जनकपुर में कथा मटकोर का रस्म पूरा किया जाता है। इस दौरान वर-वधू पक्ष के लोग एक दूसरे को मजाकिया लहजे में गीत गाकर जश्न मनाते हैं। पालकी पर माता-सीता की प्रतिमूर्ति को बैठाकर राजा जनक के गढ़ से कुछ दूरी पर गाजे बाजे के साथ कथा मटकोर का उत्सव मनाने की परंपरा है। साधु संतों में कोई नाई की भूमिका निभाता है, तो कोई राजा जनक का प्रतीक बनकर विवाह की तैयारियों का जायजा लेता है। यह दृश्य अविस्मरणीय है।

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