

जिला ब्यूरो, विवेक कुमार सिंह
बेतिया/वाल्मीकिनगर:- बिहार का इकलौता टाइगर रिजर्व वाल्मीकि टाइगर रिजर्व आज जैव विविधता और पक्षी संरक्षण के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बना चुका है। घने जंगलों, कल-कल बहती नदियों, विस्तृत घास के मैदानों और प्राकृतिक आवासों से समृद्ध यह क्षेत्र अब देशी-विदेशी पक्षियों के लिए सुरक्षित आश्रय स्थल के रूप में तेजी से उभर रहा है। यहां संकटग्रस्त गिद्धों से लेकर दुर्लभ प्रवासी पक्षियों तक की सैकड़ों प्रजातियां पाई जा रही हैं, जिससे पर्यावरण प्रेमियों, शोधकर्ताओं और पक्षी वैज्ञानिकों की रुचि लगातार बढ़ती जा रही है। वीटीआर में रेड हेडेड वल्चर, स्लेंडर-बिल्ड वल्चर और हिमालयन वल्चर जैसे संकटग्रस्त गिद्धों की मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि यहां जैव विविधता संरक्षण को गंभीरता से आगे बढ़ाया जा रहा है। भारत में पाई जाने वाली नौ प्रजातियों के गिद्धों में से आठ प्रजातियां यहां दर्ज की गई हैं। विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके इन गिद्धों के संरक्षण के लिए वन विभाग द्वारा विशेष निगरानी और संरक्षण कार्यक्रम भी संचालित किए जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि गिद्धों की मौजूदगी किसी भी जंगल के स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत होती है। सर्दियों के मौसम में वीटीआर प्रवासी पक्षियों का प्रमुख ठिकाना बन जाता है। यूरेशियन कर्लेव, नॉर्दर्न लैपविंग, ग्रे-हेडेड लैपविंग, व्हिम्ब्रल और सैंडपाइपर जैसी विदेशी प्रजातियां यहां बड़ी संख्या में पहुंचती हैं। वहीं स्थानीय पक्षियों में इंडियन पैराडाइज फ्लाईकैचर, इंडियन नाइटजार, ब्लैक-ब्रेस्टेड वीवर, ग्रीन बारबेट और व्हाइट-आइड वार्बलर प्रमुख रूप से देखे जाते हैं। हालिया सर्वेक्षण में सारस क्रेन, नाइट हैरोन, ओरिएंटल पाइड हॉर्नबिल और व्हाइट ईयर जैसी दुर्लभ प्रजातियों की भी पहचान की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार वीटीआर में पक्षियों की करीब 300 प्रजातियां पाई जाती हैं। यहां मोर, धनेश, हुदहुद, कठफोड़वा, देसी मैना, हरियल, राम तीतर, सामान्य जल मुर्गी, काली चील और विभिन्न प्रजातियों के फाख्ता आमतौर पर दिखाई देते हैं। पक्षियों की इतनी व्यापक विविधता इस क्षेत्र की समृद्ध पारिस्थितिकी और प्राकृतिक संतुलन को दर्शाती है। केवल पक्षियों के मामले में ही नहीं, बल्कि वन्यजीव और वनस्पतियों की विविधता में भी वीटीआर बेहद समृद्ध माना जाता है।

यहां 55 प्रजातियों के स्तनधारी, 26 प्रकार के रेप्टाइल, 13 प्रकार के उभयचर, 144 से अधिक घास की प्रजातियां, 86 प्रकार के पेड़ तथा 56 प्रकार की झाड़ियां पाई जाती हैं। सांपों की 43 से अधिक प्रजातियां भी यहां दर्ज की गई हैं, जिनमें दुर्लभ लंबी थूथन वाले लता सांप शामिल हैं। औषधीय पौधों के साथ-साथ डायनासोर कालीन वनस्पतियां जैसे साइकस और चीड़ भी इस क्षेत्र की विशेष पहचान हैं। नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान से सटे होने के कारण यहां वन्यजीवों की आवाजाही सहज बनी रहती है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन को मजबूती मिलती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जैव विविधता के मामले में वीटीआर ने उत्तराखंड के कॉर्बेट और उत्तर प्रदेश के दुधवा अभ्यारण्य जैसे संरक्षित क्षेत्रों को भी नई प्रजातियों की उपलब्धता में पीछे छोड़ दिया है। प्राकृतिक संपदा, दुर्लभ प्रजातियों और समृद्ध पारिस्थितिकी के कारण वाल्मीकि टाइगर रिजर्व अब न केवल पर्यटकों और पक्षी प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है, बल्कि पक्षी विज्ञान और जैव विविधता अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण शोध केंद्र के रूप में भी तेजी से उभर रहा है।










