वाल्मीकिनगर में अहिंसा कॉरिडोर सेमिनार की भव्य शुरुआत, भारत-नेपाल के 50 से अधिक टूर ऑपरेटर जुटे।

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बौद्ध और रामायणकालीन विरासत को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर लाने की पहल

जिला ब्यूरो, विवेक कुमार सिंह

बेतिया/वाल्मीकिनगर:- वाल्मीकिनगर में बुधवार से चार दिवसीय “अहिंसा कॉरिडोर सेमिनार” का भव्य शुभारंभ हुआ। इस अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में भारत और नेपाल से पहुंचे 50 से अधिक टूर ऑपरेटरों ने हिस्सा लिया। आयोजन का उद्देश्य भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान दिलाना है। कार्यक्रम की शुरुआत थारू समाज के पारंपरिक लोक नृत्य “झमटा” की आकर्षक प्रस्तुति के साथ हुई। रंग-बिरंगी वेशभूषा और लोक संस्कृति से सजे उद्घाटन समारोह ने उपस्थित अतिथियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। आयोजन में पर्यटन मंत्रालय भारत सरकार के प्रतिनिधि, सांस्कृतिक विशेषज्ञ, स्थानीय जनप्रतिनिधि और विभिन्न राज्यों एवं नेपाल से आए पर्यटन व्यवसायी शामिल हुए। सेमिनार में वक्ताओं ने कहा कि वाल्मीकिनगर क्षेत्र रामायण काल, बौद्ध काल और महात्मा गांधी के दौर से अहिंसा और शांति की परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। वर्तमान समय में भी वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में वन्यजीव संरक्षण के माध्यम से प्रकृति और जीवों के प्रति अहिंसा का संदेश दिया जा रहा है। वक्ताओं ने बताया कि वीटीआर के वनवर्ती क्षेत्रों में रहने वाली थारू जनजाति सदियों से प्रकृति संरक्षण और अहिंसा की संस्कृति को आगे बढ़ाती रही है। थारू समाज का “बरना पर्व” प्रकृति पूजा और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक माना जाता है, जिसकी चर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने कार्यक्रम “मन की बात” में कर चुके हैं। पर्यटन मंत्रालय भारत सरकार के सलाहकार कौलेश कुमार ने कहा कि यह इलाका ऐतिहासिक “रॉयल रूट” का हिस्सा रहा है। उन्होंने बताया कि सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपने यात्रा वृतांत में इस मार्ग का उल्लेख किया है। चंपारण गजेटियर के अनुसार, दरुआबारी गांव के समीप स्थित जंगल क्षेत्र को प्राचीन “रामग्राम” माना जाता है, जहां एक विशाल बौद्ध स्तूप होने के प्रमाण मिलते हैं। जंगल में मौजूद दर्जनों प्राचीन कुएं और अन्य अवशेष आज भी बौद्ध इतिहास की गवाही देते हैं। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान बुद्ध भी अपने भिक्षुओं के साथ इस क्षेत्र में आए थे। वहीं बुद्ध की मौसी और पालक माता महा प्रजापति गौतमी ने कई शाक्य स्त्रियों के साथ कपिलवस्तु से वैशाली तक इसी मार्ग से लगभग 150 मील की पैदल यात्रा की थी। सेमिनार में चितवन, कपिलवस्तु, पोखरा, लुंबिनी, बोधगया, वाराणसी, पटना, राजगीर, नालंदा, गया और महाराष्ट्र सहित कई स्थानों से आए टूर ऑपरेटर आगामी दिनों में पर्यटन विकास, सांस्कृतिक विरासत संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन सर्किट से जोड़ने पर विस्तृत मंथन करेंगे।

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