

जिला ब्यूरो, विवेक कुमार सिंह
बेतिया/वाल्मीकिनगर: भारत-नेपाल सीमा से सटे वाल्मीकिनगर और आसपास के सीमावर्ती इलाकों में इन दिनों नेपाली मूल की विवाहिता महिलाओं के सामने पहचान का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। दशकों पहले ‘रोटी-बेटी’ के रिश्ते के तहत नेपाल से विवाह कर भारत आईं ये महिलाएं अब नागरिकता पंजीकरण प्रक्रिया के तहत दस्तावेज प्रस्तुत करने की अनिवार्यता से परेशान हैं। जीवन का अधिकांश हिस्सा भारत में बिताने के बावजूद अब उन्हें अपनी पहचान साबित करने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। वाल्मीकिनगर क्षेत्र में बड़ी संख्या में ऐसी महिलाएं रहती हैं, जो 15 से 30 वर्ष पूर्व नेपाल से विवाह कर यहां आई थीं। नवलपरासी जिले की संगीता देवी, सीमा देवी और सुशीला देवी जैसी कई महिलाओं ने भारत में अपना घर-परिवार बसाया, बच्चों का पालन-पोषण किया और आज वे दादी-नानी बन चुकी हैं। इनमें से कई महिलाएं वर्षों से मतदान करती आ रही हैं तथा आधार कार्ड सहित अन्य भारतीय दस्तावेजों के साथ सामान्य जीवन व्यतीत कर रही हैं। हालांकि हाल ही में शुरू हुई नागरिकता पंजीकरण प्रक्रिया ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। भारतीय नागरिक से विवाह करने वाली नेपाली महिलाओं को भारतीय नागरिकता के लिए कम से कम सात वर्ष का निवास, वैवाहिक साक्ष्य और अन्य आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करना अनिवार्य है। आवेदन भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से किया जाना है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि अधिकांश महिलाओं के पास न तो जन्म प्रमाणपत्र है और न ही नेपाली नागरिकता का कोई प्रमाण उपलब्ध है। कई महिलाओं के मायके अब उजड़ चुके हैं, माता-पिता का निधन हो चुका है या वर्षों से संपर्क पूरी तरह टूट चुका है। ऐसे में नेपाल जाकर दस्तावेज जुटाना उनके लिए लगभग असंभव है। प्रखंड विकास पदाधिकारी बिडू कुमार राम ने बताया कि यह प्रक्रिया पारदर्शिता सुनिश्चित करने और एक सटीक डाटाबेस तैयार करने के उद्देश्य से शुरू की गई है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि नेपाल से कितनी बेटियां इस क्षेत्र में विवाह कर आई हैं। उन्होंने कहा कि यह पहल भारत-नेपाल के पारंपरिक ‘रोटी-बेटी’ संबंध को कानूनी मजबूती देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन जमीनी स्तर पर महिलाएं और उनके परिवार असमंजस में हैं। दस्तावेजों की कमी और प्रक्रिया की जटिलता के कारण उनके सामने पहचान का संकट गहराता जा रहा है। सीमावर्ती क्षेत्रों की ये बहुएं आज उम्मीद लगाए बैठी हैं कि प्रशासन उनकी व्यावहारिक समस्याओं को समझते हुए प्रक्रिया को सरल और सहज बनाएगा, ताकि दशकों पुराने रिश्तों पर कागजी औपचारिकताओं की दीवार न खड़ी हो।










