पथरीले रास्तों से वाल्मीकि आश्रम तक… वीटीआर की वादियों में रोमांचित हुए पर्यटक, लेकिन पेयजल संकट बना चुनौती।

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जिला ब्यूरो, विवेक कुमार सिंह

बेतिया/वाल्मीकिनगर:- भारत-नेपाल सीमा से सटे प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर वाल्मीकिनगर इन दिनों पर्यटकों की मेहमाननवाजी में जुटा हुआ है। जंगल, पहाड़ और नदियों की मनमोहक छटा के बीच पर्यटक यहां के धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों का आनंद ले रहे हैं। खासकर सप्ताहांत यानी शनिवार और रविवार को पर्यटकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल रही है। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (वीटीआर) की पथरीली और घुमावदार जंगल पगडंडियों से पैदल चलते हुए पर्यटक वाल्मीकि आश्रम तक पहुंच रहे हैं। इस दौरान जंगल की हरियाली, ठंडी हवाएं और पहाड़ों की खूबसूरती पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। रविवार को करीब 500 से अधिक पर्यटकों ने वन भ्रमण के साथ प्राकृतिक वातावरण में पिकनिक का आनंद लिया। कई पर्यटक अपने साथ राशन और बर्तन लेकर पहुंचे और जंगल के बाहरी क्षेत्र में स्वयं भोजन बनाकर उसका स्वाद चखा। इसी दौरान शैक्षणिक परिभ्रमण पर आए छात्र-छात्राओं में खासा उत्साह देखने को मिला। जंगल कैंप से वाल्मीकि आश्रम तक की दूरी उन्हें कम लग रही थी। पथरीले रास्तों पर दौड़ते हुए बच्चों के बीच सबसे पहले आश्रम पहुंचने की होड़ लगी रही। जंगल का कठिन मार्ग भी उनके उत्साह को कम नहीं कर पाया। छात्र-छात्राएं किसी भी तरह जल्द से जल्द वाल्मीकि आश्रम पहुंचकर वहां की ऐतिहासिक धरोहरों को देखने के लिए उत्साहित थे। वन विभाग द्वारा भी पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई व्यवस्थाएं की गई हैं। सप्ताहांत से पहले पिकनिक स्थलों की साफ-सफाई कराई जाती है और जंगल के बाहरी क्षेत्रों में पर्यटकों के विश्राम के लिए स्थान तैयार किए जाते हैं। पर्यटक वीटीआर के विभिन्न स्थलों पर प्राकृतिक वातावरण के बीच आराम से समय बिताते नजर आते हैं। इस बीच जंगल के बाहर स्थित कौलेश्वर झूला पुल भी पर्यटकों, खासकर छात्र-छात्राओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। शुक्रवार से रविवार तक यहां बड़ी संख्या में विद्यार्थी पहुंचते हैं और झूला पुल का आनंद लेते हैं। हालांकि अन्य पर्यटक भी यहां आते हैं, लेकिन छात्रों के बीच इसकी लोकप्रियता सबसे अधिक देखी जा रही है। पर्यटन के लिहाज से वीटीआर क्षेत्र जहां प्राकृतिक सौंदर्य और रोमांच से भरपूर है, वहीं यहां मूलभूत सुविधाओं की कमी भी सामने आ रही है। जंगल के अंदर प्लास्टिक की बोतलों को ले जाने पर प्रतिबंध लगाया गया है, जो पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से सराहनीय कदम है। लेकिन इसके साथ ही जंगल के अंदर पर्यटकों के लिए पेयजल की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। लंबी दूरी पैदल तय कर वाल्मीकि आश्रम पहुंचने वाले छोटे-छोटे बच्चों को लौटते समय प्यास लगने पर काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। रविवार को भी कई छात्र-छात्राएं पानी के लिए परेशान दिखे। अंततः उन्हें अपनी प्यास बुझाने के लिए बेलवा घाट तक आना पड़ा, जहां उन्हें पानी उपलब्ध हो सका। बिहार का कश्मीर कहे जाने वाले वाल्मीकिनगर में यदि पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं की समुचित व्यवस्था कर दी जाए, तो यहां आने वाले पर्यटकों के अनुभव को और बेहतर बनाया जा सकता है। फिलहाल प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक महत्व के कारण पर्यटकों का आकर्षण लगातार बढ़ रहा है, लेकिन सुविधाओं की कमी पर्यटन विकास के लिए चुनौती बनी हुई है।

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