

जिला ब्यूरो, विवेक कुमार सिंह
बेतिया/वाल्मीकिनगर:। भीषण गर्मी के आगमन से पहले ही वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना के जंगलों में जल संकट गहराने लगा है। प्राकृतिक जल स्रोत तेजी से सूख रहे हैं, जिससे वन्यजीवों के सामने पेयजल की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। बाघ, तेंदुआ, हिरण जैसे वन्यजीव पानी की तलाश में जंगल से निकलकर सड़क और रिहायशी इलाकों की ओर भटकने लगे हैं, जिससे हादसों और शिकार का खतरा बढ़ गया है। नरदेवी जंगल के समीप स्थित त्रिवेणी कैनाल, जो कभी सिंचाई का प्रमुख साधन था, अब मृतप्राय स्थिति में पहुंच चुका है। 1910 में अंग्रेजों द्वारा निर्मित यह कैनाल अब एक तालाब में तब्दील हो चुका है, जहां वर्तमान में मछली पालन होता है। लेकिन गर्मी की शुरुआत में ही इसका जलस्तर तेजी से घटने लगा है, जिससे यहां आने वाले वन्यजीवों को पानी के लिए भटकना पड़ रहा है। जल संकट के कारण वन्यजीव गंडक, तमसा और सोनभद्र नदियों की ओर रुख करते हैं, लेकिन हर जीव के लिए वहां तक पहुंचना संभव नहीं होता। ऐसे में कई वन्यजीव रास्ते में ही भटक जाते हैं और जोखिम का सामना करते हैं। इस स्थिति के पीछे जल स्रोतों की अनदेखी और प्रदूषण मुख्य कारण हैं। जो तालाब और नहरें कभी जल संरक्षण का आधार थे, आज वे कूड़ा-कचरा फेंकने के स्थान बन गए हैं। स्थानीय लोगों की उदासीनता और प्रशासनिक लापरवाही ने समस्या को और गंभीर बना दिया है। प्रकृति प्रेमी मनोज कुमार का कहना है कि इन जल स्रोतों को बचाना बेहद जरूरी है, क्योंकि ये वन्यजीवों के जीवन का आधार हैं। उनका मानना है कि प्रशासन और समाज यदि मिलकर पहल करें, तो जल स्रोतों को पुनर्जीवित कर इस संकट से निपटा जा सकता है।










