

पूर्व शिक्षक, समाजसेवी और भारतीय थारू कल्याण महासंघ के पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष के निधन से थरूहट क्षेत्र में शोक
जिला ब्यूरो, विवेक कुमार सिंह
बेतिया/वाल्मीकिनगर:- थारू समाज की आवाज बुलंद करने वाले भारतीय थारू कल्याण महासंघ के पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष एवं वरिष्ठ समाजसेवी दीप नारायण प्रसाद का शुक्रवार सुबह निधन हो गया। वह 88 वर्ष के थे। पिछले करीब एक माह से बीमारी से जूझ रहे थे और गोरखपुर के एक निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। शुक्रवार सुबह लगभग छह बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर मिलते ही थरूहट क्षेत्र समेत पूरे बगहा अनुमंडल में शोक की लहर दौड़ गई। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। दीप नारायण प्रसाद शिक्षा और सामाजिक सेवा दोनों क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान रखते थे। उन्होंने लंबे समय तक शिक्षक के रूप में कार्य किया और वर्ष 2007 में उच्च विद्यालय हरनाटाड से प्रधानाध्यापक पद से सेवानिवृत्त हुए थे। सेवा निवृत्ति के बाद भी उन्होंने समाजसेवा का रास्ता नहीं छोड़ा और पूरी सक्रियता के साथ थारू समाज के अधिकारों और विकास के लिए संघर्ष करते रहे। भारतीय थारू कल्याण महासंघ में उन्होंने लगभग दस वर्षों तक केंद्रीय अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उनके नेतृत्व में संगठन को नई दिशा और मजबूती मिली। उन्होंने थारू समाज की शिक्षा, रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य और सामाजिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। स्थानीय प्रशासन से लेकर राज्य सरकार तक समाज की समस्याओं को पहुंचाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके प्रयासों के कारण थारू समाज के बीच जागरूकता और संगठनात्मक एकता मजबूत हुई। वर्ष 2025 में महासंघ के चुनाव के दौरान उन्होंने स्वयं अपना नाम वापस लेकर युवाओं और नए नेतृत्व को आगे आने का अवसर दिया था। इसके बाद शैलेंद्र गढ़वाल को केंद्रीय अध्यक्ष चुना गया। समाज के लोग इसे उनके दूरदर्शी और लोकतांत्रिक सोच का उदाहरण मानते हैं। दीप नारायण प्रसाद ने सामाजिक कार्यों के साथ राजनीति में भी अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराई थी। वर्ष 2015 में उन्होंने वाल्मीकिनगर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव भी लड़ा था। हालांकि चुनावी सफलता नहीं मिली, लेकिन क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर उनकी सक्रियता लगातार बनी रही। अपने पीछे वह तीन पुत्रों सहित भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनके निधन पर सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक क्षेत्र से जुड़े लोगों ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए इसे थारू समाज की अपूरणीय क्षति बताया है।










