बुद्ध पूर्णिमा पर नारायणी गंडकी तट पर आस्था का महासंगम, 154 वीं महाआरती में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़।

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जिला ब्यूरो, विवेक कुमार सिंह

बेतिया/वाल्मीकिनगर । भारत-नेपाल सीमा पर स्थित बेलवा घाट परिसर में बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर 154वीं नारायणी गंडकी महाआरती का भव्य आयोजन किया गया। अंतर्राष्ट्रीय न्यास स्वरांजलि सेवा संस्थान द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम देखने को मिला। नदी तट पर सैकड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने माहौल को पूरी तरह भक्तिमय बना दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि एचेल थारू सहित कई गणमान्य अतिथियों द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया गया। इस दौरान अभिनेता सोनू चौधरी, चंद्रभान कुमार, फाइटर जयदेव कुमार, पुलिसकर्मी रोशन कुमार, स्वास्थ्य कर्मी कुमारी संगीता, समाजसेवी भारत कुमार, नमामि गंगे से जुड़े मुकेश कुमार समेत कई विशिष्ट व्यक्तित्व मौजूद रहे।
मुख्य अतिथि एचेल थारू ने अपने संबोधन में गौतम बुद्ध के जीवन दर्शन को विस्तार से रखते हुए कहा कि आज के दौर में उनके विचार मानवता के लिए मार्गदर्शक हैं। उन्होंने अहिंसा, करुणा और शांति को अपनाने पर बल दिया। वहीं संस्था के मैनेजिंग डायरेक्टर संगीत आनंद ने “बुद्धं शरणं गच्छामि” का संदेश देते हुए लोगों को बुद्ध के बताए मार्ग पर चलने का संकल्प दिलाया।


विशिष्ट अतिथि जयदेव कुमार ने कहा कि वर्तमान समय में वैश्विक तनाव और अस्थिरता के बीच बुद्ध के सिद्धांत और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। कार्यक्रम के दौरान वैशाख पूर्णिमा के धार्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया गया कि यही दिन भगवान बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण से जुड़ा है, जिससे इसका महत्व अत्यंत विशेष हो जाता है।
महाआरती के दौरान गंडक नदी का तट वैदिक मंत्रोच्चार और भजन-कीर्तन से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से आरती में भाग लिया और “गंगा मैया की जय”, “नारायणी गंडकी माता की जय” तथा “बुद्ध भगवान की जय” के जयघोष से पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया। कार्यक्रम के सफल आयोजन में नेपाल के धर्मपाल गुरु वशिष्ठ जी महाराज, पवन भट्टराई, जयकुमार गुप्ता, धर्मेंद्र कुमार गुप्ता सहित कई लोगों का सराहनीय योगदान रहा। अंत में श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरण किया गया और क्षेत्र में शांति, समृद्धि एवं सद्भावना की कामना की गई। गौरतलब है कि स्वरांजलि सेवा संस्थान वर्ष 2014 से पर्यावरण संरक्षण और जनजागरूकता के उद्देश्य से इस महाआरती का निरंतर आयोजन करता आ रहा है, जो अब एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान बन चुका है।

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