जब प्रेत को ब्रज से बाहर जाना पड़ा – पं० भरत उपाध्याय

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एक तंत्र का जानकार व्यक्ति था । उसने एक प्रेत सिद्ध कर लिया, उस प्रेत को तरह तरह के रूप बनाने आते थे । उसने प्रेत को सीखा दिया की जब मै तुम्हे बुलाऊंगा तुम कृष्ण का रूप धरके सामने आ जाना । मथुरा के मेले मे उसने अपनी दुकान लगाई । दुकान पर लिख दिया की मै साक्षात भगवान कृष्ण का दर्शन करवाऊंगा । जब कोई ग्राहक आता तो यह व्यक्ति कुछ मंत्र बोलता था और सामने साक्षात कृष्ण दिखाई पड़ते । मोरमुकुट, मेघश्याम कांति, हाथ मे बंसी । यह बात धीरे धीरे ब्रज क्षेत्र मे फैलने लगी । ठाकुर श्री विजय कृष्ण गोस्वामी उसके पास जाकर बोले की हमे भगवान कृष्ण का दर्शन कराओ । उसके मंत्र बोलते ही सामने श्रीकृष्ण स्वरूप का दर्शन हुआ । श्री विजय कृष्ण गोस्वामी सोचने लगे की भगवान के दर्शन होते ही रोम रोम खिल उठता है, आनंद की लहर दौड़ पड़ती है । यहां तो कोई आनंद नही हो रहा । पैसा लेकर कोई भगवान को बुलावे और भगवान प्रकट हो जाये , यह संभव नही । ये तो भगवान नही कोई और है । उन्होंने अपने गुरुदेव का स्मरण किया और महामंत्र का उच्चारण तीव्र गति से करने लगे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।। उस प्रेत का असली स्वरूप प्रकट हो गया । उसने अपने मालिक से कहां की मेरा शरीर जल रहा है, मै जल जाऊंगा । पता नही यह कौनसा मंत्र बोल रहा है । इस मंत्र से मेरी शक्ति क्षीण हो रही है । इसका मंत्र जप बंद करवाओ और इसको मेरे सामने से हटाओ । श्री विजय कृष्ण गोस्वामी ने उससे कहा की शपथ पूर्वक कहो की हम पुनः किसीको ठगेंगे नही और ब्रज की सीमा से बाहर चले जाओ । उस प्रेत ने कहां की वह पुनः ब्रज मे कभी नही आएगा और किसीको भी ठगने मे किसी तांत्रिक की सहायता भी नही करेगा । इसके बाद श्री विजय कृष्ण गोस्वामी वहां से चले गए ।

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