नेपाल से भटककर वीटीआर सीमा तक पहुंचा दुर्लभ जंगली भैंसा,

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लुप्तप्राय ‘अर्ना’ की मौजूदगी से वन विभाग अलर्ट। सीमावर्ती गांवों में बढ़ी उत्सुकता और सतर्कता।

बेतिया/वाल्मीकिनगर:- वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (वीटीआर) की सीमा से सटे उत्तर प्रदेश के सोहगीबरवा वन्यजीव प्रभाग अंतर्गत निचलौल वन क्षेत्र की उत्तरी बीट में एक दुर्लभ जंगली जल भैंसा दिखाई देने से वन विभाग और स्थानीय ग्रामीणों में उत्सुकता के साथ-साथ सतर्कता का माहौल है। वन अधिकारियों ने इसकी पहचान एशियाई जंगली जल भैंसा (बुबालस अर्ना) के रूप में की है, जिसे विश्व स्तर पर लुप्तप्राय प्रजातियों में गिना जाता है। वन विभाग के अनुसार यह विशालकाय वन्यजीव फिलहाल निचलौल वन क्षेत्र की उत्तरी बीट में मौजूद है, जो बिहार और वाल्मीकि टाइगर रिजर्व की सीमा से सटा हुआ इलाका है। भैंसे की गतिविधियों और लोकेशन पर लगातार नजर रखी जा रही है ताकि वह आबादी वाले क्षेत्रों की ओर न बढ़े और किसी अप्रिय घटना की आशंका न बने। इसके लिए वनकर्मियों की विशेष टीम चौबीसों घंटे निगरानी में जुटी हुई है। वन क्षेत्राधिकारी सुनील कुमार राव ने बताया कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है और विभाग सतर्कता के साथ कार्य कर रहा है। उन्होंने ग्रामीणों से जंगल के भीतर अकेले न जाने तथा किसी भी वन्यजीव की गतिविधि की सूचना तत्काल वन विभाग को देने की अपील की है। वन्यजीव विशेषज्ञ अभिषेक के अनुसार एशियाई जंगली जल भैंसा केवल एक दुर्लभ जीव ही नहीं, बल्कि घास के मैदानों के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण अंग है। यह लंबी घास की वृद्धि को नियंत्रित कर पर्यावास विविधता और जैव विविधता के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह भैंसा नेपाल से भटककर भारतीय वन क्षेत्र में पहुंचा है। नेपाल में इसे स्थानीय भाषा में “अर्ना” कहा जाता है। वर्तमान में नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान में इसकी संख्या बेहद सीमित बताई जाती है। प्रकृति संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय संघ (आईयूसीएन) ने इस प्रजाति को वैश्विक स्तर पर लुप्तप्राय श्रेणी में रखा है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में इसकी कुल आबादी चार हजार से भी कम मानी जाती है। घरेलू भैंसों के साथ अंतःप्रजनन, शिकार, बीमारियां तथा आनुवंशिक विविधता में कमी इसके अस्तित्व के लिए सबसे बड़े खतरे हैं। लगभग 800 से 1200 किलोग्राम वजन और 150 से 190 सेंटीमीटर ऊंचाई वाले इस विशाल जीव को हाथी और गैंडे के बाद दुनिया के सबसे बड़े स्थलीय स्तनधारियों में गिना जाता है। ऐसे में वीटीआर की सीमा से सटे जंगलों में इसकी मौजूदगी वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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