

बराज पर हाईटेक निगरानी के बावजूद पिछली तबाही की यादें कर रहीं परेशान
जिला ब्यूरो, विवेक कुमार सिंह,
बेतिया/वाल्मीकिनगर:- मानसून की आहट के साथ ही गंडक नदी के तटवर्ती बाढ़ प्रभावित गांवों में चिंता और बेचैनी बढ़ने लगी है। हर वर्ष बाढ़ और कटाव की मार झेलने वाले ग्रामीण इस बार भी संभावित जलप्रलय की आशंका से सहमे हुए हैं। पिछले वर्षों में आई बाढ़ से फसलों की बर्बादी, घरों के जलमग्न होने और विस्थापन की पीड़ा आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। यही कारण है कि चकदहवा समेत कई गांवों में लोग समय रहते जरूरी सामान सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने, पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था करने और संभावित विस्थापन की तैयारी में जुट गए हैं। ग्रामीण बताते हैं कि पिछली बाढ़ में धान और गन्ने की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई थी। कई दिनों तक घरों में पानी भरा रहने के कारण परिवारों को तटबंधों पर तिरपाल लगाकर जीवन बिताना पड़ा। पीने के पानी, भोजन और पशुओं के चारे तक का संकट उत्पन्न हो गया था। इन्हीं कड़वे अनुभवों से सबक लेते हुए इस बार लोग पहले से अधिक सतर्क हैं। चकदहवा निवासी गुलाब अंसारी, पप्पू कुमार, रामसमुझ पंडित और उमेश कुमार बताते हैं कि गंडक नदी की ओर देखते ही पिछले वर्षों की भयावह तस्वीरें आंखों के सामने तैरने लगती हैं। उनका कहना है कि यदि जलस्तर इसी तरह बढ़ता रहा तो आने वाले दिनों में फिर घरों में पानी घुस जाएगा और परिवारों को कई महीनों तक तटबंधों पर शरण लेनी पड़ सकती है। ग्रामीणों का आरोप है कि बाढ़ के समय सरकारी राहत व्यवस्था अक्सर अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंच पाती, जिससे लोगों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। हालांकि फिलहाल गंडक नदी अपने तटों के भीतर बह रही है, लेकिन पिछले एक सप्ताह से जलस्तर में लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जुलाई में नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों में भारी वर्षा होने पर गंडक का जलस्तर अचानक बढ़ जाता है और कई गांव बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं। बाढ़ नियंत्रण की दृष्टि से वाल्मीकिनगर स्थित अंतरराष्ट्रीय गंडक बराज अहम भूमिका निभाता है। भारत-नेपाल समझौते के तहत निर्मित इस बराज में कुल 36 फाटक हैं, जिनमें 18 नेपाल और 18 भारत की सीमा में स्थित हैं। बाढ़ के दौरान जल संसाधन विभाग हर घंटे जल निकासी का बुलेटिन जारी कर संबंधित जिलों को सतर्क करता है, ताकि निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके। गंडक बराज के संचालन के लिए स्काडा सिस्टम, इलेक्ट्रिक पैनल और मैनुअल तीनों व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं। कंट्रोल रूम से कंप्यूटर आधारित प्रणाली के माध्यम से जलस्तर और फाटकों की निगरानी की जाती है। बराज की डिजाइन क्षमता लगभग साढ़े आठ लाख क्यूसेक पानी की है। हालांकि नदी में सिल्ट जमा होने के कारण इसकी वास्तविक डिस्चार्ज क्षमता प्रभावित हुई है। वर्ष 2002 में अत्यधिक जलदबाव के कारण दायां एफलेक्स बांध टूटने की घटना आज भी लोगों के मन में भय पैदा करती है। मानसून के सक्रिय होने के साथ प्रशासन और जल संसाधन विभाग ने बाढ़ से निपटने की तैयारियों का दावा किया है, लेकिन गंडक किनारे रहने वाले हजारों परिवारों की चिंता अब भी कम नहीं हुई है। ग्रामीणों की निगाहें एक ओर आसमान में उमड़ते बादलों पर हैं तो दूसरी ओर गंडक नदी के बढ़ते जलस्तर पर, क्योंकि उनके लिए हर मानसून केवल बारिश नहीं, बल्कि जीवन और आजीविका की कठिन परीक्षा लेकर आता है।










