

बगहा/मधुबनी। पूर्व प्राचार्य पं०भरत उपाध्याय ने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर बांसी धाम के नमामि गंगे योग शिविर में भाग लेते हुए कहा कि-हमारी संस्कृति शुरू से ही सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया की है! संस्कृत भाषा की युज धातु से योग बना है, जिसका अर्थ है युक्त करना, मिलाना अथवा जोड़ना। इस लिए अपने मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार की उच्छृंखल वृत्तियों पर नियन्त्रण करना ही योग है। तदनन्तर श्रीमद्भगवद्गीता के “समत्वं योगम् उच्यते” की समत्वरूप ब्राह्मी दृष्टि का आरम्भ होता है और जब “निज प्रभुमय देखहिं जगत्” की अन्तर्भावना दृढ़ होगी तो “केहि सन करहिं बिरोध” कौन किसके साथ विरोध करेगा? कोई किसी के साथ नहीं। तब भाग्यवान् जीव निर्बाध गति से अपने निष्कण्टक पथ पर आगे ही आगे बढ़ता है। इस अवसर पर योग प्रशिक्षक संतोष कुमार त्रिपाठी, नीरज कुमार त्रिपाठी, दिनेश कुमार गुप्ता, आकाश सिंह सहित सैकड़ों लोग उपस्थित रहे।










