वाल्मीकिनगर में पर्यटन को नया रंग, झमटा नृत्य पर रेंजर की नजर, कलाकारों को दिए सुधार के निर्देश।

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जिला ब्यूरो, विवेक कुमार सिंह

बेतिया/वाल्मीकिनगर: सुहावने मौसम के साथ वाल्मीकिनगर का पर्यटन स्थल इन दिनों सैलानियों की पहली पसंद बना हुआ है। पहाड़ों की गोद से निकलती नारायणी नदी की कल-कल बहती धारा और घने जंगलों की शुद्ध वायु पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंचकर प्राकृतिक सुंदरता का आनंद ले रहे हैं। ऐसे में पर्यटकों के मनोरंजन को और बेहतर बनाने के लिए वन विभाग भी सक्रिय नजर आ रहा है। वन विभाग द्वारा पर्यटकों के लिए समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें जनजातीय समुदाय के कलाकार झरका, झमटा और डांडिया जैसे पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत कर रहे हैं। इन प्रस्तुतियों का उद्देश्य न केवल मनोरंजन करना है, बल्कि स्थानीय संस्कृति से पर्यटकों को रूबरू कराना भी है। पहले यह सुविधा केवल टूर पैकेज के तहत आने वाले पर्यटकों तक सीमित थी, लेकिन अब सामान्य पर्यटकों को भी इसका लाभ दिया जा रहा है।
इसी बीच वाल्मीकिनगर रेंजर सत्यम कुमार को इन कार्यक्रमों में आकर्षण की कमी को लेकर शिकायत मिली। शिकायत की सच्चाई जानने के लिए उन्होंने शनिवार रात बिना किसी औपचारिकता के आम पर्यटकों के बीच बैठकर कार्यक्रम का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने पाया कि कलाकारों की प्रस्तुति में अपेक्षित ऊर्जा और समन्वय की कमी है, जिससे कार्यक्रम का प्रभाव कम हो रहा है।


रेंजर सत्यम कुमार ने बताया कि कलाकारों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए हैं और उनसे प्रदर्शन में सुधार लाने को कहा गया है। उन्होंने कहा कि जब तक प्रस्तुति में आकर्षण और जीवंतता नहीं होगी, तब तक पर्यटक पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाएंगे। साथ ही यह भी बताया कि सभी कलाकारों की उपस्थिति पंजी में दर्ज की जाती है और नियमित समीक्षा की जाती है। वन विभाग ने अब हर शनिवार और रविवार को नियमित रूप से इन सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन का निर्णय लिया है। 2025-26 पर्यटन सत्र के अंतिम चरण में इस पहल को और विस्तार दिया जा रहा है। साथ ही, कार्यक्रमों में नवीनता लाने के लिए नए कलाकारों को शामिल करने की योजना भी बनाई गई है, ताकि पर्यटकों को हर बार कुछ नया देखने को मिले। झमटा टीम के नेतृत्वकर्ता शुभम नीरज के अनुसार, झरका नृत्य परंपरागत रूप से अतिथियों के स्वागत में किया जाता है, जबकि झमटा नृत्य फसल की बुआई और कटाई के समय प्रस्तुत किया जाता है। इस प्रकार के आयोजन न केवल मनोरंजन का माध्यम बन रहे हैं, बल्कि आदिवासी संस्कृति के संरक्षण और प्रचार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

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