

जिला ब्यूरो, विवेक कुमार सिंह
बेतिया/वाल्मीकिनगर:- वाल्मीकि टाइगर रिजर्व क्षेत्र में मानव-हाथी द्वंद को कम करने की दिशा में वन विभाग ने एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए एक दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यशाला का आयोजन किया। बाल्मीकि नगर स्थित वन विभाग के सभागार में आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में एमजी पीजी कॉलेज गोरखपुर के छात्र-छात्राओं, स्थानीय ग्रामीणों तथा फील्ड स्टाफ ने सक्रिय रूप से भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य जंगली हाथियों से होने वाले नुकसान को कम करना और मानव व वन्यजीव के बीच संतुलन स्थापित करना रहा। कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि सीमावर्ती नेपाल से जंगली हाथियों का वाल्मीकि टाइगर रिजर्व क्षेत्र में लगातार आवागमन बना रहता है। भोजन और पानी की तलाश में ये हाथी अक्सर गांवों की ओर रुख कर लेते हैं, जिससे किसानों की फसलों, घरों और आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसी चुनौती से निपटने के लिए प्रशिक्षण में कई आधुनिक और व्यवहारिक उपायों का प्रदर्शन किया गया।
विशेषज्ञों ने ट्रिप अलार्म, फ्लिकर लाइट, मिर्च के धुएं और घरेलू सामग्री से तैयार “स्मेली” जैसे उपायों के उपयोग की जानकारी दी। इन तकनीकों की खासियत यह है कि ये हाथियों को बिना नुकसान पहुंचाए गांवों से दूर रखने में प्रभावी साबित होती हैं। प्रशिक्षण के दौरान हाथियों के व्यवहार, उनकी गतिविधियों और पहचान के तरीकों पर विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि हाथियों के मूवमेंट पैटर्न और उनकी मनोवृत्ति को समझकर ही प्रभावी ढंग से संघर्ष को कम किया जा सकता है। साथ ही, यदि किसी व्यक्ति का हाथी से आमना-सामना हो जाए तो घबराने के बजाय शांत रहकर सुरक्षित दूरी बनाए रखने और सही दिशा में हटने जैसे उपायों को अपनाने की सलाह दी गई। कार्यक्रम में वन विभाग की नीतियों और दिशा-निर्देशों की भी जानकारी दी गई। बताया गया कि हाथी अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आई यू सी एन) की लाल सूची में संकटग्रस्त प्रजाति के रूप में शामिल हैं। ऐसे में इनकी सुरक्षा के साथ-साथ मानव जीवन की रक्षा करना भी उतना ही आवश्यक है। विशेषज्ञों ने हाथियों की पारिस्थितिक भूमिका पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ये वन पारिस्थितिकी तंत्र के ‘इको-इंजीनियर’ होते हैं। एक वयस्क हाथी प्रतिदिन 100 किलोग्राम से अधिक भोजन करता है और बीजों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे जंगलों का पुनर्जनन होता है। इसके अलावा हाथियों द्वारा बनाए गए रास्ते अन्य वन्यजीवों के लिए भी उपयोगी होते हैं। कार्यक्रम के दौरान प्रोजेक्ट मैनेजर अभिषेक ने कहा कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम मानव-हाथी संघर्ष को कम करने और सह-अस्तित्व की भावना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस मौके पर डॉ. सौरभ वर्मा, (फील्ड बायोलॉजिस्ट) डब्लू डब्लू एफ के अहवर आलम, डब्लू टी आई के पावेल घोष, बी एच एन एस की खुशबू, प्रोफेसर नमिता कुमार, डॉ. जितेंद्र कुमार, डॉ. शैलेंद्र कुमार सहित 47 प्रतिभागी मौजूद रहे।










