“रौद्र” नामक संवत्सर का शुभागमन -पं० भरत उपाध्याय

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बगहा/मधुबनी, बगहा अनुमंडल अंतर्गत मधुबनी प्रखंड स्थित राजकीय कृत हरदेव प्रसाद इंटरमीडिएट कॉलेज मधुबनी के पूर्व प्राचार्य पं०भरत उपाध्याय ने सनातन नववर्ष की पूर्व संध्या पर कहा कि -चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 19 मार्च गुरुवार से आरंभ हो रहे विक्रम संवत 2083 के पावन अवसर पर कल बड़गांव में ठाकुरअमर सिंह के यहां भव्य कार्यक्रम आयोजित है। उन्होंने कहा कि, हमें अपने जीवन में सकारात्मक संकल्पों का संचार करना चाहिए।नव संवत्सर मात्र तिथियों का परिवर्तन नहीं, अपितु जड़, चेतन, प्रकृति और सांस्कृतिक मूल्यों के पुनर्जागरण का महापर्व है। बसंत ऋतु के शुभागमन के साथ जब प्रकृति पल्लवित- पुष्पित होकर नूतन श्रृंगार करती है, तब वह हमें भी विचारों में नवीनता लाने का संदेश देती है। इस ऋतु में ताप और शीत के मध्य जो साम्यता परिलक्षित होती है वही हमारे जीवन का आदर्श होनी चाहिए। हमारा व्यवहार प्रेम, त्याग और विवेक के त्रिवेणी संगम से अभिसिंचित हो ।संसाधनों का पशविक दोहन करने के स्थान पर उनका संरक्षण करना ही प्रकृति के प्रति हमारी वास्तविक कृतज्ञता है। नूतन वर्ष आत्म परिष्कार का स्वर्णिम अवसर है। अनुशासन का अर्थ केवल समयबद्धता नहीं, अपितु इंद्रियों पर संयम और वाणी की मधुरता है। हमें आधुनिकता और तकनीक का स्वागत अवश्य करना चाहिए किंतु अपनी नैतिक मर्यादाओं और पारिवारिक मूल्यों को बलि देकर नहीं! जब भेदभाव से दूर सबमें हम एक ही ईश्वर का दर्शन करते हैं, तब ऐसा सद्भाव संपूर्ण जगत के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो जाता है। बसंत की मधुमयी प्रकृति, शीत के कोप से मुक्त होता परिवेश और समृद्ध होती धरती के कारण चैत्र मास श्रीमान मास कहलाता है। धर्म विग्रह श्री राम के प्राकट्य का महीना बनकर यह चैत्र मास हमारी संस्कृति का आदरणीय मास समझा जाता है, चैत्र एवं वैशाख मास जिन्हें क्रमशः मधु तथा माधव मास कहा जाता है। सनातन संस्कृति में भारतीय नव वर्ष का शुभारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है, जिसे नया संवत या नवसंवत्सर कहते हैं। यह नया संवत मानव जीवन में नूतन उत्साह,उमंग और आत्म चेतना लेकर आता है।

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