सुखी रहने का सूत्र है-विनम्रता!-पं० -भरत उपाध्याय

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जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं। जद्दपि ताहि कामना नाहीं।। तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ।। विचार करें कि हममें से कौन ऐसा है जो सुख नहीं चाहता? हम, आप या प्रत्येक जीव सुख की खोज में है। एक पक्षी भी अपनी घोंसले का निर्माण इसलिए करते हैं ताकि सुख मिले। अर्थात् हर कोई सुख संपत्ति प्राप्ति के प्रयास में है। किन्तु आपने समुद्र को जल रूपी संपत्ति (समुद्र का धन अगाध जल ही है) प्राप्त करने के लिए प्रयास करते हुए देखा है क्या? वो नदियों से कहता है कि जल भर भर कर लाओ? वो ऐसा नहीं करता फिर भी नदियां जल भर भर कर सागर में लाते रहती हैं।तो इसका कारण क्या है?संसार की दृष्टि में भले ही सागर प्रयास करते हुए नहीं देखा गया हो,या प्रयास नहीं करता हो, किन्तु

समुद्र की एक बहुत बड़ी विशेषता है कि उसमें गहराई है, वो सरोवरों नदियों से बड़ा होकर भी सबसे नीचे बैठा हुआ है।

हमलोग जब रेलवे स्टेशन पर जाते हैं तो वहां पट्ट पर लिखा हुआ दिखाई देगा कि – समुद्र तल से ऊंचाई – 100 मीटर आदि कुछ किन्तु कहीं ऐसा देखा है कि समुद्र तल से इतने नीचे है? नहीं न? क्योंकि समुद्र इन सबसे नीचे है। और उसे नीचे रहने के कारण – सरिता सागर महुँ जाहीं। एक नहीं बल्कि प्रत्येक नदियां सागर में ही जल लेकर जाती हैं। वहीं रावण जो कोई व्यक्ति विशेष नहीं बल्कि हमारे और आपके अभिमान के प्रतीक है, वह अभिमान के शिखर पर है(विनम्रता शून्य हैं), और इच्छा है कि नदियां (सुख) मेरे पास आए।  मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।। जब तक इस अहं के शिखर पर हैं, सुख रूपी सरिता हमारे पहुंच में नहीं आ सकता और

कदा सुखी भवाम्यहम्

की स्थिति बनी रहेगी। दशरथ जी को मन में ग्लानि हुई तो वे तुरंत गुरु के गृह जाकर उनके श्री चरणों का आश्रय लिया – एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत नाहीं।। तो,गुरु गृह तुरत गयउ महिपाला।
और चरन लागि

करि बिनय बिसाला।।

चक्रवर्ती महाराज होकर भी कुटिया में रहने वाले विप्र के चरणों में गिर गए और बिनय बिसाला अर्थात् एक दीन हीन की बहुत विनती करते हैं। ये है विनम्रता!किन्तु एक पक्ष वो है जो गुरु माता पिता के सामने भी – सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं। अतः साधनों में घिरे रहकर भी दुखी जीवन है, अतृप्ति है।इसलिए यदि हमें वास्तविक सुख चाहिए तो माता, पिता ,गुरु और साधु के आश्रय लेना चाहिए,हमारे अंदर विनम्रता रूपी गहराई होनी चाहिए,तभी सुख युक्त संपत्ति को प्राप्त कर सकते हैं…

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