दशरथ तथा दशानन के कर्म ही सुखालय और दुखालय हैं -पं० भरत उपाध्याय

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तब उठि भूप बसिष्ठ कहुँ दीन्हि पत्रिका जाइ।
कथा सुनाई गुरहि सब सादर दूत बोलाइ।।
सुनि बोले गुर अति सुख पाई।

पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई || वशिष्ठ जी कहते हैं कि यही संसार किसी के लिए सुखालय है और किसी के लिए दुखालय भी है,और ये किसी और के कारण नहीं बल्कि स्वयं के कर्मों पर है -काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत कर्म भोग सबु भ्राता।। संसार उसके लिए दुखालय है जो तृष्णा से ग्रस्त है,और जो दिन रात पापकर्म में लगे रहता है।त्रेतायुग में अर्थात् एक ही काल में संसार में दो की तूती बोलती थी और वो दोनों हैं दशमुख तथा दशरथ।दशमुख के भय से या कर्म से पुण्य भागकर किसी गुफा में छिप जाता है (देव स्वरूप पुण्य कर्म के परिणाम है और वे रावण के आगमन सुनकर मेरू पर्वत के गुफा में छिप जाते हैं। ) वहीं दशरथ को देखकर पुनः स्थापित

सुरपति बसइ बाँह बल जाके।

इसका परिणाम क्या हुआ?

पाप कर्मों में रत रहने वाला रावण (रावण में दुर्मति/दुर्बुद्धि है, इसे वो स्वयं स्वीकार करता है। प्रमाण – शिव तांडव स्तोत्र – कदानिलिंपनिर्झरी निकुंज कोटरे वसन् विमुक्त दुर्मतिः सदा शिरः स्थमंजलिं वहन्। ) तो यही कारण है कि समस्त भोगों से युक्त सोने के महलों में रहने वाला रावण, अप्सराओं से घिरा हुआ रावण शिव जी से प्रार्थना करता है कि – हे भगवन्! मैं कब सुखी होउँगा- विमुक्त लोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरण कदा सुखी भवाम्यहम् । ध्यान दीजिए जिसके यहां पवनदेव झाड़ू लगाते हैं, देवराज इन्द्र पानी भरते हैं, ब्रह्मा जी नित्य उपस्थिति लगाते हैं, वो जब एकांत में होता है तो कहता है कि – कदा सुखी भवाम्यहम्। अर्थात् यदि पाप कर्मों में रत हैं तो सुख के साधनों में डूबे हुए रहकर भी सुखी नहीं रह सकते। उसके बुलाने पर भी सुख आता नहीं और जो धर्मशील हैं, धर्म जिनके आचरण में है, वो यदि साधनविहीन हो तो भी सुखी जीवन व्यतीत करते हैं। सुख उनके पास बिना मांगे उसी प्रकार दौड़े चली जाती है जैसे सागर की ओर नदियां जाती हैं। तो विचार करिए कि हमारे लिए सुख के साधनों का संग्रह आवश्यक है या पुण्य संग्रह? हमें दशरथ बनना आवश्यक है या दशानन?सच मानिए सुख की कुंजी इसी में छिपा हुआ है ।

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