



पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान सूर्य की दो पत्नियाँ थीं— संज्ञा और छाया। माता छाया के गर्भ से शनि देव का जन्म हुआ। जन्म के समय शनि देव का वर्ण श्याम (काला) था। यह देखकर सूर्य देव ने क्रोधवश उन्हें अपना पुत्र मानने से इंकार कर दिया और कठोर वचनों से उनका अपमान किया।पिता के इस कटु व्यवहार से आहत होकर माता छाया अपने पुत्र शनि देव के साथ अलग हो गईं और उन्हें ‘कुंभ’ नामक स्थान में निवास करना पड़ा।
सूर्य देव के निरंतर दुर्व्यवहार से व्यथित होकर माता छाया ने उन्हें कुष्ठ रोग का श्राप दे दिया। श्राप से क्रोधित सूर्य देव ने प्रतिशोध में अपनी प्रचंड अग्नि से शनि देव और माता छाया के घर को भस्म कर दिया।जब सूर्य देव की पहली पत्नी संज्ञा के पुत्र यमराज को इस पारिवारिक कलह का ज्ञान हुआ, तो वे अत्यंत व्यथित हो गए। यमराज ने अपने पिता सूर्य देव को श्राप से मुक्ति दिलाई और उन्हें समझाया कि वे माता छाया और शनि देव के प्रति स्नेह और करुणा का भाव रखें।
अपनी भूल का एहसास होते ही सूर्य देव स्वयं शनि देव से मिलने उनके निवास पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि शनि देव का सब कुछ जलकर नष्ट हो चुका था। फिर भी, पुत्र शनि देव ने बिना किसी कटुता के, काले तिल अर्पित कर प्रसन्नतापूर्वक अपने पिता का स्वागत किया।पुत्र के इस अद्भुत क्षमाभाव, प्रेम और विनम्रता से सूर्य देव का हृदय द्रवित हो गया।सूर्य देव ने प्रसन्न होकर शनि देव को ‘मकर’ नामक नई राशि भेंट की और उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे ‘मकर’ और ‘कुंभ’ दोनों राशियों के स्वामी होंगे। साथ ही यह दिव्य वरदान भी दिया कि—
जब-जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करेंगे, जो भी श्रद्धा से काले तिल अर्पित करेगा, उसका जीवन सुख, समृद्धि और शांति से भर जाएगा।इसी कारण मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव की पूजा में काले तिल का विशेष महत्व माना गया है।यह पावन पर्व क्षमा, प्रेम, सद्भाव और पारिवारिक पुनर्मिलन का महान प्रतीक है।










