

सुगौली संधि के बाद बदली गंडक की धारा बनी विवाद की जड़, वन विभाग का दावा 860 करोड़ की वन संपदा का नुकसान।
जिला ब्यूरो, विवेक कुमार सिंह
बेतिया/वाल्मीकिनगर :- भारत-नेपाल सीमा पर स्थित वाल्मीकिनगर वन क्षेत्र के सुस्ता और चकदहवा इलाके में लगभग 5478 एकड़ भूमि को लेकर चला आ रहा सीमा विवाद एक बार फिर चर्चा में है। दो सदियों से अधिक पुराने इस विवाद का संबंध सुगौली संधि से माना जाता है। संधि के अनुसार गंडक नदी के मध्य प्रवाह को दोनों देशों की सीमा निर्धारित किया गया था, लेकिन समय के साथ नदी की धारा बदलने से सीमा निर्धारण का प्रश्न जटिल होता चला गया।
जानकारों के अनुसार गंडक नदी के भारतीय भूभाग की ओर खिसकने के बाद नदी द्वारा छोड़ी गई भूमि पर धीरे-धीरे नेपाली नागरिकों ने खेती-बारी और बसावट शुरू कर दी। वर्तमान में सुस्ता और चकदहवा क्षेत्र की हजारों एकड़ भूमि पर नेपाली नागरिकों के कब्जे का दावा किया जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि भारतीय गांव चकदहवा से सटी कई भूमि पर भी नेपाली गतिविधियां लगातार बढ़ी हैं। सीमा विवाद का इतिहास कई संघर्षों और तनावपूर्ण घटनाओं से भरा रहा है। वर्ष 1964 में रमपुरवा क्षेत्र में भारतीय ग्रामीणों और नेपाली शाही सेना के बीच हिंसक झड़प हुई थी। इसके बाद फरवरी 1964 में दोनों देशों के अधिकारियों के बीच कोतराहां में बैठक हुई, जहां संयुक्त सीमांकन होने तक यथास्थिति बनाए रखने पर सहमति बनी थी। हालांकि इसके बाद भी विवाद का स्थायी समाधान नहीं निकल सका। पुराने प्रशासनिक अभिलेख बताते हैं कि सुस्ता क्षेत्र में पहले भारतीय परिवारों का बहुमत था, लेकिन समय के साथ जनसंख्या संरचना में बड़ा बदलाव आया। वर्तमान में क्षेत्र में पक्के मकान, विद्यालय, स्वास्थ्य केंद्र, पुलिस चौकी तथा नेपाली सुरक्षा बलों की मौजूदगी की बात कही जाती है। इससे स्थानीय स्तर पर चिंता और असंतोष बढ़ा है। वन विभाग के अनुसार अतिक्रमण के कारण वाल्मीकि टाइगर रिजर्व और उससे जुड़े वन क्षेत्रों को भारी क्षति हुई है। विभागीय आंकड़ों में अब तक लगभग 860 करोड़ रुपये मूल्य की वन संपदा के नुकसान का दावा किया गया है। जीपीएस आधारित सर्वेक्षणों में नरसही जंगल सहित कई क्षेत्रों पर नेपाल के प्रभाव और अतिक्रमण की जानकारी दर्ज की गई है। इसी बीच करीब 900 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले बिहार के एकमात्र बाघ अभयारण्य वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में पुनः घुसपैठ का मुद्दा गर्मा गया है। वन विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार विवादित सुस्ता-चकदहवा क्षेत्र में लगभग 78 एकड़ वन भूमि पर नेपाली नागरिकों द्वारा खेती शुरू किए जाने की सूचना मिली थी। इस मामले को गंभीर मानते हुए तत्कालीन क्षेत्र निदेशक ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को पत्र भेजकर स्थिति से अवगत कराया था तथा वन अधिनियम के तहत कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू की गई थी। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अतिक्रमित भूमि को चिन्हित कर लिया गया है और पूरे सीमा क्षेत्र पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। वहीं स्थानीय लोगों का मानना है कि सुस्ता-चकदहवा विवाद केवल भूमि का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता, सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा विषय है। वर्षों से चली आ रही द्विपक्षीय वार्ताओं के बावजूद यह अंतरराष्ट्रीय सीमा विवाद आज भी स्थायी समाधान की प्रतीक्षा कर रहा है।










