वीटीआर में ढोलों की दमदार वापसी, सांभर बना शिकार, दुर्लभ एशियाई जंगली कुत्तों की सक्रियता ने बढ़ाई उम्मीदें।

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बेतिया/वाल्मीकिनगर:- वीटीआर में जीवन और मृत्यु का संघर्ष प्रकृति का अभिन्न हिस्सा है। ऐसा ही एक रोमांचक और दुर्लभ दृश्य हाल ही में वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (वीटीआर) के घने जंगलों में देखने को मिला, जहां एशियाई जंगली कुत्तों यानी ढोलों के एक झुंड ने सामूहिक रणनीति के तहत एक सांभर का सफल शिकार किया। इस घटना ने वन्यजीव प्रेमियों, पर्यावरणविदों और संरक्षण विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। विशेषज्ञ इसे वीटीआर के स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र और सफल संरक्षण प्रयासों का सकारात्मक संकेत मान रहे हैं। जानकारी के अनुसार जंगल के एक जलस्रोत के निकट पानी पीने पहुंचे सांभर पर ढोलों के झुंड ने अचानक हमला कर दिया। खतरे को भांपते ही सांभर ने बच निकलने का भरसक प्रयास किया और काफी देर तक संघर्ष भी किया, लेकिन ढोलों की संगठित रणनीति और सामूहिक हमले के सामने वह अंततः पराजित हो गया। जंगल में यह पूरा घटनाक्रम प्राकृतिक जीवन चक्र का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। वन विभाग द्वारा लगाए गए कैमरा ट्रैप तथा जंगल सफारी के दौरान मिले साक्ष्यों से वीटीआर में ढोलों की सक्रिय मौजूदगी की पुष्टि हुई है। वन्यजीव विशेषज्ञ अभिषेक ने बताया कि ढोल जैसी दुर्लभ और संकटग्रस्त शिकारी प्रजातियों की उपस्थिति किसी भी वन क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। ऐसी प्रजातियां केवल उन्हीं क्षेत्रों में लंबे समय तक टिक पाती हैं, जहां पर्याप्त शिकार उपलब्ध हो, सुरक्षित आवास मौजूद हो तथा पारिस्थितिक संतुलन मजबूत हो।
विशेषज्ञों के अनुसार ढोल दुनिया के सबसे संगठित सामाजिक शिकारियों में शामिल हैं। ये आमतौर पर 15 से 20 सदस्यों के झुंड में रहते हैं और अद्भुत तालमेल के साथ शिकार करते हैं। चीतल, सांभर तथा अन्य हिरण प्रजातियां इनके प्रमुख भोजन स्रोत हैं। समूह में शिकार करने की क्षमता के कारण ये अपने से कहीं बड़े और तेज वन्यजीवों को भी मात देने में सक्षम होते हैं।
वन अधिकारियों का कहना है कि वीटीआर में ढोलों की बढ़ती गतिविधियां यह दर्शाती हैं कि यहां चल रहे संरक्षण, आवास प्रबंधन और वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रम सकारात्मक परिणाम दे रहे हैं। दुर्लभ प्रजातियों की वापसी न केवल जंगल के स्वास्थ्य का प्रमाण है, बल्कि यह भी संकेत है कि वाल्मीकि टाइगर रिजर्व जैव विविधता संरक्षण के क्षेत्र में लगातार मजबूत हो रहा है। आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र संकटग्रस्त वन्यजीवों के लिए देश के प्रमुख सुरक्षित आवासों में अपनी पहचान और अधिक सुदृढ़ कर सकता है।

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