वीटीआर के जंगलों में बढ़ रहा जंगली कुत्तों का कुनबा, कैमरे में कैद हुई दुर्लभ गतिविधियां।

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लगभग 100 एशियाई जंगली कुत्तों की मौजूदगी का अनुमान, जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन के लिए शुभ संकेत।

जिला ब्यूरो, विवेक कुमार सिंह

बेतिया/वाल्मीकिनगर:- वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (वीटीआर) के घने जंगलों में दुर्लभ एशियाई जंगली कुत्तों यानी ढोल की बढ़ती मौजूदगी वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक सकारात्मक संकेत के रूप में सामने आई है। कभी बेहद दुर्लभ मानी जाने वाली यह प्रजाति अब वीटीआर के विभिन्न वन क्षेत्रों में दिखाई देने लगी है। हाल के वर्षों में जंगल सफारी के दौरान पर्यटकों ने कई बार ढोलों के झुंडों को देखा है, वहीं वन विभाग द्वारा लगाए गए कैमरा ट्रैप में भी उनकी गतिविधियां लगातार रिकॉर्ड हो रही हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार ढोल, जिसे एशियाटिक वाइल्ड डॉग, इंडियन वाइल्ड डॉग या रेड डॉग के नाम से भी जाना जाता है, कैनीडे परिवार का सदस्य है। इसका लाल-भूरा शरीर, घनी झबरीली पूंछ और नुकीला थूथन इसकी प्रमुख पहचान है। यह प्रजाति अपनी विशिष्ट सीटी जैसी आवाजों के लिए भी जानी जाती है, जिनका उपयोग वे शिकार और आपसी संवाद के दौरान करते हैं। वन्य जीव विशेषज्ञ अभिषेक बताते हैं कि ढोल अत्यंत सामाजिक और संगठित शिकारी होते हैं। ये आमतौर पर 15 से 20 सदस्यों के झुंड में रहते हैं और समूह में शिकार करने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। शिकार के समय पूरा झुंड रणनीतिक ढंग से किसी जानवर को चारों ओर से घेर लेता है, जिससे उसके बच निकलने की संभावना बेहद कम हो जाती है। यही सामूहिक शक्ति इन्हें जंगल के सबसे प्रभावी शिकारियों में शामिल करती है।
ढोलों की बहादुरी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई बार वे बाघ और तेंदुए जैसे शीर्ष शिकारी जीवों का भी सामना कर लेते हैं। बड़े झुंड प्रायः चीतल, सांभर और जंगली सूअर जैसे खुर दार वन्य जीवों का शिकार करते हैं, जबकि छोटे समूह खरगोश, माउस हिरण और अन्य छोटे जीवों पर निर्भर रहते हैं। आवश्यकता पड़ने पर ये मृत जानवरों का मांस भी खा लेते हैं।
वन अधिकारियों का कहना है कि वीटीआर का विस्तृत वन क्षेत्र, घने जंगल, घास के मैदान और नदी तटीय पारिस्थितिकी तंत्र ढोलों के लिए आदर्श आवास उपलब्ध करा रहा है। पर्याप्त शिकार प्रजातियों की उपलब्धता और बेहतर संरक्षण प्रयासों के कारण इस संकटग्रस्त प्रजाति की संख्या में धीरे-धीरे वृद्धि हो रही है। हालांकि इनकी नियमित गणना नहीं होती, लेकिन वन विभाग और विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार वर्तमान में वीटीआर में ढोलों की संख्या 100 से अधिक हो सकती है।
गौरतलब है कि इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर ने ढोल को लुप्तप्राय श्रेणी में रखा है। ऐसे में वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में इनकी बढ़ती उपस्थिति संरक्षण प्रयासों की सफलता और स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत मानी जा रही है।
वन अधिकारियों के अनुसार नवंबर से मार्च तक का समय ढोलों को देखने के लिए सबसे उपयुक्त होता है। ठंड के मौसम में उनकी गतिविधियां बढ़ जाती हैं और सुबह तथा शाम की सफारी के दौरान इनके दिखने की संभावना अधिक रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि वीटीआर में ढोलों की बढ़ती संख्या यह दर्शाती है कि यहां का वन पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत हो रहा है तथा जैव विविधता संरक्षण की दिशा में किए जा रहे प्रयास सार्थक परिणाम दे रहे हैं। यह न केवल वन्यजीव प्रेमियों के लिए सुखद समाचार है, बल्कि देश में दुर्लभ वन्यजीवों के संरक्षण की सफलता की एक महत्वपूर्ण कहानी भी है।

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