वीटीआर में लौटे दुर्लभ ‘लेजर एडजुटेंट स्टार्क’, जंगल की जैव विविधता को मिला नया जीवन।

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दक्षिण-पूर्व एशिया और असम-बंगाल में पाए जाने वाले विलुप्तप्राय ‘मदनटेक’ पक्षी की बढ़ती संख्या से वन विभाग उत्साहित, पर्यटकों के आकर्षण का बना केंद्र।

जिला ब्यूरो, विवेक कुमार सिंह

बेतिया/वाल्मीकिनगर:- वाल्मीकि टाइगर रिजर्व
एक बार फिर अपनी समृद्ध जैव विविधता और दुर्लभ वन्यजीवों की मौजूदगी को लेकर चर्चा में है। इस बार यहां विलुप्तप्राय प्रवासी पक्षी ‘लेजर एडजुटेंट स्टार्क’ की बढ़ती संख्या ने वन्यजीव प्रेमियों, पक्षी विशेषज्ञों और पर्यटकों का ध्यान आकर्षित किया है। स्थानीय लोगों के बीच ‘मदनटेक’ या ‘छोटा गरूड़’ के नाम से प्रसिद्ध यह दुर्लभ पक्षी इन दिनों वीटीआर के जंगलों की शोभा बढ़ा रहा है। कई वर्षों बाद इन पक्षियों की उल्लेखनीय मौजूदगी को वन विभाग पर्यावरणीय संतुलन और बेहतर संरक्षण का सकारात्मक संकेत मान रहा है। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व अपने घने जंगलों, वन्यजीवों और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। यहां शाकाहारी और मांसाहारी जीवों की बड़ी संख्या होने के साथ-साथ 300 से अधिक प्रजातियों के पक्षी भी पाए जाते हैं। हिमालयी क्षेत्रों सहित विभिन्न देशों और राज्यों से आने वाले प्रवासी पक्षी हर वर्ष मौसम की अनुकूलता के अनुसार यहां पहुंचते हैं। इन पक्षियों के संरक्षण और उनकी संख्या का आकलन करने के लिए वन विभाग तथा डब्ल्यूडब्ल्यूएफ जैसी संस्थाएं समय-समय पर अधिवास स्थलों का निरीक्षण और गणना करती हैं।
इसी क्रम में वीटीआर के कक्ष संख्या टी-33 दरूआबारी वन क्षेत्र में 25 से 30 लेजर एडजुटेंट स्टार्क देखे गए हैं। यह पक्षी मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया, असम और बंगाल के जंगलों में पाए जाते हैं। दलदली और आर्द्र भूमि वाले क्षेत्रों में रहना पसंद करने वाले ये पक्षी अपने शांत स्वभाव और आकर्षक बनावट के कारण आसानी से लोगों का ध्यान खींच लेते हैं।
सारस प्रजाति से संबंध रखने वाले इन पक्षियों की लंबी चोंच, भारी-भरकम शरीर और लंबी टांगें इन्हें अन्य पक्षियों से अलग पहचान देती हैं। इनका मुख्य भोजन कीड़े-मकोड़े, चूहे और मछलियां हैं। खास बात यह है कि ये पक्षी मृत जानवरों के मांस पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि स्वयं शिकार कर भोजन प्राप्त करते हैं। वन अधिकारियों के अनुसार ‘मदनटेक’ सामान्यतः एकाकी जीवन जीना पसंद करते हैं और झुंड में कम ही दिखाई देते हैं। हालांकि प्रजनन काल के दौरान ये वृक्षों की ऊंची टहनियों पर छोटे-छोटे घोंसले बनाकर अपने समुदाय के साथ रहते हैं। वन विभाग के बायोलॉजिस्ट सौरभ वर्मा ने बताया कि ‘लेजर एडजुटेंट स्टार्क’ को आईयूसीएन की रेड लिस्ट में शामिल किया गया है, जो इसके विलुप्त होने के खतरे को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि वन विभाग द्वारा जंगल में रहने वाले वन्यजीवों और पक्षियों के संरक्षण को लेकर लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। जंगलों में बेहतर संरक्षण, सुरक्षित वातावरण और पर्याप्त भोजन उपलब्ध होने के कारण अब इन दुर्लभ पक्षियों की वापसी देखने को मिल रही है, जो वीटीआर के लिए बेहद शुभ संकेत।

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