पुत्र हों या पुत्री पिता को गौरवान्वित करें! तो यह पिता के पुण्य कर्म का फल है-: पं० भरत उपाध्याय

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जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही।।
जनक – राजा जनक जी, पिता (पिता को भी जनक कहा जाता है)। सुकृत – सुन्दर कृति, पुण्य कर्म,धर्म कर्म, परोपकार, दया,दान आदि। वैदेही – विदेह पुत्री सीता जी, विशिष्ट शरीर धारिणी, विशिष्ट की विशिष्ट पुत्री।
शास्त्रों का मत भी है और (कुछ अपवादों को छोड़कर) सामान्य सिद्धांत भी यही है कि पुत्र पिता का आत्मा होता है अर्थात् पिता के आकांक्षाओं का मूर्त रूप, पिता के पुण्य फल। किन्तु इस पुत्र शब्द से पुत्री अलग नहीं हैं। अतः चाहे बेटा हो या बेटी, यदि वो अपने पिता के गौरव को बढ़ाने के कार्य कर रहे हैं तो ये पिता के पुण्य कर्मों का फल है। वैसे जनक जी का भी पुत्र हैं जिनका नाम है लक्ष्मीनिधि। किन्तु उनकी प्रसिद्धि उतनी नहीं है जितनी उनकी पुत्री सीता जी की है। अतः पुत्र हों या पुत्री यदि पिता को गौरवान्वित करें तो पिता के सुकृति (पुण्य कर्म) का फल है। इसलिए – जनक सुकृत मूरति बैदेही।
सुपुत्र की भांति ही सुपुत्री भी पुण्य कर्म फल के परिणाम हैं, गोस्वामी जी कहते हैं इसमें कोई भेद नहीं है। जिन गोस्वामी जी को लोग स्त्री विरोधी कहते हैं वही गोस्वामी जी राम जी से पहले सीता जी की महिमा का बखान करते हैं कि – सती सिरोमनि सिय गुन गाथा। सोइ गुन अमल अनूपम पाथा।।
अब जो ताड़का,मंथरा, सूर्पनखावत् हों तो वहां उसी अनुरूप लेखनी चली है और चलनी भी चाहिए भले ही उनके अनुयायियों/अनुगामियों को अच्छी न लगे। क्योंकि – गति कूर कबिता सरित की, जो अनुचित है उसके प्रति कोमल कवि भी कठोर लेखनी चलाते हैं। आइए मूल विषय की ओर
जनकपुरवासी आपस में चर्चा करते हैं कि यहां तो पुण्य ही पुण्य दिखाई दे रहे हैं। सीता जी – जनक जी के पुण्य,
राम जी – दशरथ जी के पुण्य, जनकपुर में जन्म लेना – हम सभी के पुण्य,इस विवाह को देखें ये भी पुण्य,सीता जी हों या राम जी इनसे बोलने मिलने रहने, हास , ये सब पुण्य ही पुण्य हैं..

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